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Monday, November 18, 2019

वरिष्ठ कवि श्री नरेश उनियाल जी द्वारा "ज्यू त ब्वनु च" काव्य संग्रह की समीक्षा

सादर नमस्कार प्रिय मित्रों.. 🙏
"ज्यू त ब्वनु च"..... !!!
जी... यही शीर्षक है इस काव्य संग्रह का, जो आप इस समय मेरे हाथों में देख रहें हैं...

भाई अनूप सिंह रावत की 52 बेहतरीन गढवाळी रचनाओं से सुसज्जित यह काव्य संग्रह मुझे कल ही प्राप्त हुआ है..
आपकी इस सप्रेम भेंट के लिए आपका शुक्रिया अदा करता हूँ भाई रावत जी... बहुत धन्यवाद मुझे इसके योग्य समझने के लिए.. 🙏
काव्य संग्रह में सम्मिलित रचनाओं के बारे में हिन्दी में लिख रहा हूँ...
ताकि मेरे सभी मित्र (हिन्दी भाषी भी) इस संग्रह के सार को समझ पाएं..
अभी परसों ही हमने उत्तराखंड राज्य की 19वीं जयंती मनाई है... पर राज्य का विकास अवरुद्ध सा है.. इसी चिंता को व्यक्त करती हुई शानदार रचनाएँ 'ब्वाला कब तक', 'अलग बात च', 'द बोला तुम सै' और विकास की आस की जग्वाळ (इंतजारी) करती कविता 'जग्वाळ' अपने राज्य के प्रति भाई अनूप की चिंता को अभिव्यक्त करते हैं !

अपनी संस्कृति, परम्पराओं, रीति-रिवाज़ एवम रहन सहन का परित्याग कर हम लोग पाश्चात्य प्रवाह में बहे चले जा रहें है..इस चिंता की बेहतरीन अभिव्यक्ति 'मेरी पछ्याँण', 'या दुन्या', 'कतगा बदल ग्या अब उत्तराखंड', 'चबोड़', और 'कतगा बदलिगे जमानु' कविताओं में संन्निहित है!
पलायन की पीड़ा को झेलती रचनाएँ 'जै का बाना', 'याद रख्यान', 'छेन्द मौळयार', और 'पहाड़ै ज्वन्नि अर पाणि' इस संग्रह की जान हैं..
यहाँ पर अपनी एक रचना भी मुझे याद आती है, उसका उल्लेख करने की अनूप भाई से क्षमा सहित इजाजत चाहता हूँ कि..
"उन्दरि का बाटा..
रौडि गैनी,
दौड़ि गैनी,
अर बौगि गैनी,
पहाडौ ज्वन्नी अर पाणि..!
एैंच पहाड़ मा रै गिनी त..
नंगी डांडा,
रीता भांडा,
अर
द्यवतोँ की धरति तैं लूटण वळा
वोट का मंगदरा.. !!"
© नरेश उनियाल

युवा कवि जी की श्रृंगार रस से परिपूर्ण रचनाएँ भी इस संग्रह में शामिल हैं... 'अजाण सि अन्वार', और 'घस्यारी' कविता इस रस का प्रतिनिधित्व कर रही हैं..
हमारी देवभूमि कई कुप्रथाओं का शिकार हो रही है, इस व्यथा पर भी अनूप भाई की कलम खूब चली है..'निरभै दारु', 'मनख्यात', 'दहेज-प्रथा' 'कन्या भ्रूण हत्या', जरा इनै सूणा' और 'दैंत ऐ गेनी देवभूमि मा' जैसी रचनाएँ देवभूमि के लिए कवि की चिंता को अभिव्यक्त करती हैं.. !!
जिनका बालपन इस पुण्यभूमि देवभूमि में व्यतीत हुआ हो, वह भला अपनी इस हरी-भरी वसुंधरा को कैसे भूल सकता है... अपनी इस टीस को कवि ने 'कै दिन मैना सालों बिटिन' कविता में व्यक्त किया है !
प्रवासी बेटे -बहू और पोती-पोतों को घर बुलाती बूढ़े माँ बाप की करुण पुकार ('ऐसु रूड़ी मा', 'रैबार', 'देवभूमि त्वै भट्याणी च' और 'धन्यवाद तेरु रूड़ी' रचनाओं में) हृदय को झकझोर जाती हैं !
व्यंग पर भी भाई अनूप ने अच्छी पकड़ बनाई है.. "स्वचणू छौं नेता बणि जौं", "उन त मि" और "बल मी मतदाता छौं" जैसी कविताएं आपको खूब हँसाती हैं !
पहाड़ ही पहाड़ को देखकर रो रहें हैं..पहाड़ों की यह दुर्दशा "पहाड़ मा" कविता में परिलक्षित होता है !
गढ़ गौरव आदरणीय श्री नरेंद्र सिंह नेगी दा का पहला सदाबहार गीत याद आ रहा है.. "सेरा बस्ग्याळ बौंण मा, ह्यूंद कुटण मा, रूड़ी पीसी बितैना, म्यार सदानि यनि दिन रैना!"...इसी (central idea) भाव पर आधारित रचना "पहाड़ा की नारी" बेहतरीन प्रस्तुति है..
"महाभारत कलजुग मा" रचना कहती है कि महाभारत के नकारात्मक पात्र आज भी हमारे बीच मौजूद हैं !
अन्य भी कई खूबसूरत रचनाएँ इस काव्य संग्रह की जान हैं... जिनका जिक्र यहाँ नहीं कर पा रहा हूँ..
आदरणीय मदन मोहन डुकलान जी की शानदार पुस्तक समीक्षा, श्री धीरेन्द्र रावत जी का शब्द संयोजन और मेरे बहुत प्रिय, भाई अतुल गुसाईं 'जाखी' जी का आवरण पृष्ठ सज्जा इस काव्य संग्रह को चार चाँद लगाते हैं...
पुस्तक को अवश्य खरीदें, पढ़ें और हमारी नई पीढ़ी को इसका अवलोकन अवश्य करायें ताकि हमारी अपनी गढवाळी बोली के संरक्षण हेतु युवा भाई अनूप रावत का यह भगीरथ प्रयास अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके !
सादर धन्यवाद, नमस्कार !!
** नरेश उनियाल
(स. अ., हिन्दी)
पैठाणी, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड |
सोमवार, 11/11/2019

Thursday, July 11, 2019

केदारनाथ डायरी

तारीख थी 3 और दिन था बुधवार, मैं ऑफिस में था। करीब दोपहर 2:30 बजे मेरा फोन बजा और मैंने फोन उठाया तो देखा देवेंद्र सुंदरियाल भैजी का फोन था। मैंने कॉल ली और उधर से भैजी बोले केदारनाथ आ रहा है? बाबा जी का बुलावा है और मैंने आपको ही पहले पूछा है। मैंने उन्हें कहा रुको अभी थोड़ी देर में बताता हूँ। फिर मैंने ऑफिस में बात की और घर पर माँ को बोला कि मैं केदारनाथ जा हूँ। माँ बोली किसके साथ? तो मैंने फिर उन्हें बताया तो माँ बोली चले जा बुलावा आया है। फिर मैंने सुंदरियाल भैजी को फोन किया और बोला मैं आ रहा हूँ आपके साथ और पूछा कब जाना है? उधर से भैजी बोले तैयार हो जाओ 4:30 तक जाना है। फिर मैं ऑफिस से घर आ गया और जाने की तैयारी करने लगा। मैंने अपना सामान बैग में रखा और भैजी के फ़ोन का इंतजार करने लगा। 4:30 हो गए पर वो नहीं आये, फोन किया तो बोले कुछ काम आ गया है, जैसे ही आपके घर के पास आऊंगा तो फ़ोन कर दूंगा। 6:00 बजे फ़ोन आया कि घर के बाहर मुख्य सड़क पर आ जाओ। मैं काला पत्थर (इंदिरापुरम) पर खड़ा हो गया और गाड़ी आ गयी। गाड़ी में सुरेंद्र कुमार जी (जो कि गाड़ी चला रहे थे) और देवेंद्र सुंदरियाल भैजी (www.northfinders.com) थे। फिर मैं गाड़ी में बैठ गया और केदारनाथ की यात्रा शुरू हो गयी।

मुझे लगा था कि भैजी अपने परिवार के साथ जा रहे हैं, किन्तु वो अकेले ही जा रहे थे। मैंने पूछा तो बोले अचानक से ही प्लान बन गया और मुझे सबसे पहले आपकी ही याद आयी तो सोचा अकेले जाने से बढ़िया आपको साथ ले चलूँ। फिर बातें होने लगी और सुरेंद्र जी ने बताया कि वो राजस्थान से हैं और गाड़ी चलाने का काम करते हैं और देवेंद्र जी के साथ वो बहुत समय से काम कर रहे हैं। हिमाचल और उत्तराखंड में वो पर्यटकों को अक्सर ले जाते रहते हैं। गाड़ी चलाते हुए सुरेंद्र कुमार जी अपने जीवन के अनुभव भी बता रहे थे। जो कि बहुत ही रोमांचक था। 10:00 बजे हम लोग मुज्जफ्फरनगर में शिवा ढाबे में रुके और भोजन किया। फिर सफर आगे बढ़ता गया और हम लोग उत्तराखंड के बॉर्डर (रुड़की) पहुँच गए। जहाँ पर गाड़ी वालों को सवारियों के बारे में बताना पड़ता है, जिसके लिए हम लोगों ने पहले से ही आवेदन फॉर्म में जानकारी लिख रखी थी। पुलिस से वेरिफिकेशन करवा कर आगे बढ़ गए। हम लोगों को रात को ऋषिकेश में रुकना था। देवेंद्र भैजी ने सारी व्यवस्था पहले ही कर रखी थी। रात को करीब 12:00 बजे हम लोग ऋषिकेश (होटल कैलाश गंगा) पहुंचे। वहां पर देवेंद्र भैजी के जानकार पी. एस. नेगी जी (Chopta View Resort के संचालक) और उनके पुत्र पहले से पहुंच गए थे। हम लोगों को सुबह साथ ही जाना था। फिर हम लोग सो गए।
हम लोगों ने तय किया था कि सुबह 5:00 बजे आगे गंतव्य की ओर निकल जायेंगे। नेगी जी तो समय पर उठ कर तैयार हो गए पर हम लोग रात को देर से सोये तो थोड़ी देर से उठे। उनका फोन आया तो हम लोग उठे। उठकर देखा बाहर बारिश हो रही थी। फिर हम लोग तैयार होने लगे। करीब 6:00 बजे हम लोगों का सफर ऋषिकेश से आगे के लिए शुरू हो गया। आगे से नेगी जी अपनी गाड़ी में चल पड़े और उनके पीछे हम लोग। बारिश लगातार हो रही थी। जिससे सफर और भी सुहावना हो गया था। हम लोग फिर ब्यासी पर रुके और चाय पी, फिर आगे की ओर बढ़ चले। सड़क पर ज्यादा ट्रैफिक नहीं था और अब चारधाम जाने वाली सड़क (ऑलवेदर रोड) भी अच्छी बन गई है। काम अभी चल ही रहा है किंतु अब सड़क पहले से बेहतर बन गयी है और उम्मीद है कि जल्द ही पूरा काम हो जाने पर चारधाम वाले श्रद्धालुओं का सफर और भी अच्छा हो जायेगा।
गंगा किनारे चलते-चलते देवप्रयाग आ गया जहाँ पर अलकनंदा और भागीरथी नदी का संगम है। यहां से ही यह नदी गंगा नाम से जानी जाती है। जहां से फिर अलकनंदा नदी के किनारे-किनारे सड़क जा रही है। श्रीनगर (गढ़वाल) होते हुए हम लोग रुद्रप्रयाग पहुंचे। जहाँ पर वरिष्ठ पत्रकार बीरेंद्र सुंदरियाल जी से मिले और फिर उनके साथ रुद्रप्रयाग के जिला अधिकारी (डी.एम.) श्री मंगेश घिल्डियाल जी से मिलने जा पहुंचे। उनके साथ हमारे क्षेत्र के प्रसिद्ध पर्यटक स्थल गुजडूगढ़ी को विकसित करने हेतु वार्ता करनी थी। क्योंकि जिला अधिकारी घिल्डियाल जी भी उसी क्षेत्र से हैं। किन्तु वो जिले के समस्त अधिकारियों की माह की समीक्षा बैठक में थे। पता चला की बैठक 5:00 बजे तक खत्म होगी। उस समय 12:30 बज रहे थे। हम लोगों ने सोचा कि गंतव्य की ओर चल पड़ते हैं। फिर किसी ओर समय डी.एम. जी से मिल लेंगे। नेगी जी बोल रहे थे कि आज उनके रिसोर्ट (मस्तूरा) में चलो। किन्तु हमने कहा कि आज हम लोग गुप्तकाशी जा रहे हैं। कल वहां से केदारनाथ जायेंगे और वापस आकर आपके यहाँ आएंगे। फिर रुद्रप्रयाग से हम का गुप्तकाशी के लिए चले गए और नेगी जी अपने घर/रिसोर्ट की ओर निकल पड़े।
रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी और अलकनंदा नदी का संगम है और केदारनाथ जाने वाली सड़क मंदाकिनी नदी के किनारे-किनारे जाती है। तिलबाड़ा-अगस्त्यमुनि-चंद्रपुरी-भीरी-कुंड होते हुए हम लोग 4:15 बजे गुप्तकाशी पहुंचे। जहाँ पर होटल ‘हॉलीडेज हिमालयन’ में हम लोगों को रात्रि विश्राम के लिए रुकना था। हम लोग गाड़ी से उतरे ही थे कि अचानक से मेरी मुलाकात श्री प्रदीप बिष्ट जी से हुई। उन्होंने दूर से हमें देख लिया था और सामने आये। बोले मुझे लग रहा था कि रावत जी यहाँ कहाँ से आ गए! बिष्ट जी गुप्तकाशी के एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक हैं। हम दोनों ने बी. एड. एक साथ ही किया था और हम दोनों एक ही साथ पी.जी. में रहते थे। फिर वो बोले कि कुछ काम से बैंक जा रहा हूँ थोड़ी देर में मिलता हूँ। मैंने भी कहा कि मैं भी तब तक फ्रेश हो जाता हूँ। हम लोग होटल के अपने कमरे में गए और हाथ मुँह धो कर फ्रेश हो गए। साथ में तब तक चाय भी आ गयी। 1 घंटे बात बिष्ट जी आये। देवेंद्र भैजी और सुरेंद्र कुमार जी बोले वो थोड़ी देर आराम करेंगे। आप घूम कर आ जाओ और मैं उनके साथ गुप्तकाशी बाजार घूमने चला गया। उन्होंने अपना स्कूल दिखाया जो कि सड़क से थोड़ा सा नीचे है। फिर बातचीत करते हुए हम लोग बाजार में टहलने लग गए। 1 घंटे बाद जब वापस आ रहे थे तो देवेंद्र भैजी और सुरेंद्र जी भी मार्केट में मिल गए। बोले कल यात्रा के लिए जरुरी सामान ले लेते हैं। बिष्ट जी फिर अपने स्कूल में चले गए, क्योंकि उनको बच्चों को एक ट्यूशन देना था। हम लोगों ने फिर बाजार से छाता और जरुरी सामान खरीद लिया।
थोड़ी देर बाजार में घूमने के बाद हम लोग वापस होटल आ गए। होटल में रेस्टोरेंट नहीं था तो पास के ही एक रेस्टोरेंट से खाना पैक करवा कर ले आये। रात हो चुकी थी और हम लोगों को सुबह बाबा केदार के दर्शन के लिए भी जाना था तो हम लोग खाना खाकर करीब 10:00 बजे सो गए। सुबह 7:00 बजे उठे, हमने चाय मंगवाई और चाय पी कर फिर तैयारी करने लगे। तैयार होकर होटल से निकले और पास के ही एक रेस्टोरेंट में हमने नाश्ता किया और फिर सोनप्रयाग के लिए चल पड़े।
फाटा के आस-पास बहुत से हेलिपैड बने हुए हैं। जहाँ से लोग हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जा सकते हैं। किंतु हम लोगों ने पैदल यात्रा करने का पहले से ही सोच रखा था। नारायणकोटी-फाटा-सीतापुर होते हुए करीब 10:00 बजे हम लोग सोनप्रयाग पहुँच गए। वहां से आगे बाहर की गाड़ियों को नहीं जाने देते हैं। तो हमारे उस्ताद जी वहां पर हमें छोड़कर सीतापुर चले गए। यहाँ से केदारनाथ का सफर अब हम दोनों को करना था। सबसे पहले हमने सोनप्रयाग में अपना बायो-मैट्रिक पंजीकरण करवाया। जो कि केदारनाथ यात्रा के लिए आवश्यक है। जिसके बिना यात्रा नहीं कर सकते हैं। पंजीकरण के बाद हम लोग लोकल टैक्सी में बैठ गए। टैक्सी से हम लोग गौरीकुंड पहुँच गए। सड़क वहीं तक जाती है और वहां से आगे का सफर हम लोगों को पैदल चलकर करना था।
करीब 11:30 बजे हम लोग बाबा केदार के दर्शन के लिए गौरीकुंड से पैदल चल पड़े। गौरीकुंड से केदारनाथ तक 16 किमी का पैदल रास्ता है। रास्ते पर बहुत से श्रद्धालु थे। कोई दर्शन करके वापस आ रहा था तो कोई जा रहा था। शुरू में रास्ता हल्की चढ़ाई वाला था। हम लोग चलने लगे. 2 किमी चलने के बाद हम लोग छोड़ी पर रुके और मैगी खायी और चाय पी। थोड़ी दे रुकने के बाद हम लोग फिर चलने लगे। देवेंद्र भाई थोड़ा धीरे-धीरे चल रहे थे। पता नहीं क्यों उनसे ठीक से चला नहीं जा रहा था। तो हम लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। हल्की- हल्की बारिश होने लग गई थी। हम लोग छाता ओढ़कर चलने लगे। जंगलचट्टी पहुंच कर हम लोग रुक गए और फिर वहां पर हमने खाना खाया। वहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आ रहा था किंतु वहां पर सरकार द्वारा फ्री वाई-फाई की सुबिधा दी गयी। जिसे प्रयोग कर हमने भी अपने-अपने घर पर यात्रा जानकारी दी। थोड़ी देर रुकने के बाद हम फिर से आगे बढ़ने लगे।
धीरे-धीरे हम लोग भीमबली पहुंचे। वहां पर रूककर हमने फिर से हल्का-फुल्का खाना खाया और चाय पी। बारिश अब भी हो रही थी। फिर हम लोग आगे बढ़ गए। भीमबली से आगे अब नया रास्ता बना है, जिसे 2013 की आपदा के बाद बनाया गया है। क्योंकि पुराना रास्ता पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। यह रास्ता थोड़ा चढ़ाई वाला है। तो हम लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। भीमबली में पुल पार करते हुए एक पंडित जी मिले, जो कि खाटली-साबली पट्टी के पुरोहित हैं। जगह-जगह पर आराम करने के लिए और बारिश से बचने के लिए सरकार द्वारा शेल्टर बनाये गए हैं। तो हम लोग थोड़ी-थोड़ी देर उन पर रूककर चल रहे थे।
बहुत से श्रद्धालु हेलीकॉप्टर से भी केदारनाथ जा रहे थे. बहुत से लोग घोड़ों पर तो कुछ लोग पालकी और पिट्ठू में बाबा केदार के दर्शन लिए जा रहे थे तो बहुत से वापस आ रहे थे। राजकोट गुजरात से आये एक परिवार के साथ भी बात हुई. जिन्होंने बताया कि वो लोग 3 धामों की यात्रा कर चुके हैं और आज सीतापुर रुकेंगे और बद्रीनाथ जायेंगे।
चढ़ते-चढ़ते हम लोग छोटी लिंचोली पहुंचे। रास्ते में बहुत से लोगों से बातचीत होती रही। नैनबाग (टिहरी) से आया एक परिवार भी हम लोगों के साथ-साथ ही चल रहा था। उनके साथ बातचीत करते हुए हम लोग आगे बढ़ रहे थे। फिर बड़ी लिंचोली आया। वहां पर हम लोग चाय पीने के लिए रुक गए। वो लोग चले गए, क्योंकि उनके घर के बुजुर्ग और बच्चे घोड़ों पर आगे चले गए थे। फिर कुछ देर आराम करने के बाद हम लोग आगे चल पड़े। हम लोग केदारनाथ के बेस कैम्प के पास पहुंच गए। वहां पर चाय पीने के लिए रुके तो वहां पर फिर से टिहरी से आया पूरा परिवार हमें मिल गया। वो लोग भी चाय पीने के लिए वहां पर रुके हुए थे। उनके दोनों छोटे बच्चे सो गए थे। शाम ढल रही थी। बातचीत करते-करते अँधेरा हो गया। उस परिवार ने वहीं पर रुकने का निर्णय कर लिया। हम लोग भी पहले वहीं पर रुकने की सोच रहे थे किंतु फिर सोचा मंदिर तक पहुंच ही जाते हैं। वहां से जो कि मात्र 1.50 किमी रह गया था।
हम जैसे ही बाहर आये तो बाहर बहुत ठंडी हवा चल रही थी। थोड़ा आगे बढे तो लाउडस्पीकर पर मंत्रोच्चार की आवाज सुनाई दे रही थी। जिससे शरीर में जोश सा आ गया और हम लोग मंदिर की और चलने लगे। केदार घाटी में ठण्ड नीचे के मुकाबले काफी ज्यादा थी। हम लोग रात को करीब 9:30 बजे केदारनाथ के मुख्य मंदिर में पहुंच गए। मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे। बहुत सारे श्रद्धालु मंदिर के आस-पास थे और लगभग सभी फ़ोन से अपने घरवालों को मंदिर के दर्शन करवा रहे थे। रात के अंधरे में लाइट की रोशनी में मंदिर का नजारा देखने लायक था। मन को बहुत शांति मिल रही थी। हमने बाबा केदार को प्रणाम किया और फिर अपने-अपने घर पर वीडियो कॉल के जरिये बात की। घर वालों को भी रात को बाबा केदार का अद्भुत नजारा दिखाया।
हम को रात को 'पाटलिपुत्र होटल' में रुकना था। एक पंडित जी ने होटल का रास्ता बताया। फिर हम लोग होटल पहुंच गए। होटल पहुंच कर हम लोग अपने कमरे में गए और हाथ-पैर धो कर बैठे थे कि होटल के स्टाफ का एक लड़का खाना लेकर कमरे में ही आ गया। खाना और गर्म पानी दे गया। फिर हम लोगों ने खाना खाया। तब तक करीब 11:00 बजे गए थे। फिर हम दोनों सोने लग गए। कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला, क्योंकि 16 किमी पैदल चल कर आये थे। मेरी नींद खुली तो 5:00 बज रहे थे। मैं उठकर बाथरूम गया तो पानी बहुत ही ठंडा आ रहा था। गीजर भी नहीं चल रहा था। बाहर जाकर देखा तो होटल का स्टाफ भी नहीं उठा था।
फिर मैंने ठन्डे पानी से ही मुंह धोया। तो हाथ और मुंह सुन्न हो गए। थोड़ी देर बाद मैं फिर से बिस्तर के अंदर घुस गया और फोन चलाने लग गया। देवेंद्र भाई उठे और बोले कि उनको रात को ठीक से नींद नहीं आयी, थोड़ी देर और सोयेंगे। उनको मैंने फिर 7:00 बजे जगाया। रात को जहां बादल छाए हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, वहीं सुबह मौसम एकदम साफ था और धूप खिली हुई थी। अब तक होटल वाले भी उठ गए थे और उनको बताया तो उन्होंने बाहर से गीजर का मेन स्विच चालू किया। फिर जाकर गीजर चला। चाय आयी और चाय पीने के बाद मैं नहाने चला गया। फिर मेरे बाद देवेंद्र भैजी ने नहाया और दोनों फिर बाबा केदार के दर्शन के लिए मंदिर गए।
सुनहरी धूप में बाबा केदार का मंदिर चमक रहा था। बहुत से श्रद्धालु मंदिर के बाहर दर्शन के लिए खड़े थे। आज ज्यादा भीड़ नहीं थी। क्योंकि समय भी सुबह का था और जुलाई में वैसे भी भीड़ कम हो जाती है। बाबा केदार के अच्छे से दर्शन करने के लिए यही सबसे बढ़िया समय होता है। क्योंकि यात्रा के प्रथम चरण में श्रद्धालुओं की संख्या बहुत ज्यादा होती है।
हम ने मंदिर के पास की एक दुकान से प्रसाद लिए और एक पंडित जी को पूजा के लिए बोला। फिर हम लोग मंदिर में गए। जहाँ पर करीब 40-50 लोग पंक्ति में खड़े थे। फिर हमें पुरोहित जी मिल गए, जो हमें VIP एंट्री से अंदर ले गए और पूजा शुरू की। करीब 8-10 मिनट तक हम लोगों ने पूजा की और बाबा के केदार के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। बाबा केदार के दर्शन करने के बाद मैंने घर पर वीडियो कॉल किया और घरवालों को फिर से मंदिर लाइव दिखाया। सुबह का नजारा जो कि देखने लायक था। फिर हम लोग पुरोहित जी के घर गए जो कि मंदिर के समीप ही था। उन्होंने चाय पिलाई और हम लोगों का रिकॉर्ड अपनी डायरी में लिखा। फिर हम लोग भैरब मंदिर की ओर चल पड़े। जो कि वहां से करीब 1 किमी की दूरी पर है। हम लोग मंदिर गए और बाबा भैरब नाथ जी के दर्शन किये।
मंदिर के ऊपर बुग्याल है। फिर हम दोनों वहां पर गए और प्रकृति की अनुपम छटा का आनंद लेने लगे। भैरव मंदिर थोड़ी ऊंचाई पर है, वहां से पूरी केदारघाटी का सुंदर नजारा दिखता है। 1 घंटे तक वहां पर रुके। फिर हम नीचे आ गए। पूरी केदारघाटी में पुनर्निर्माण कार्य अभी भी चल रहा है। मंदिर के ऊपर मंदाकिनी के किनारे सुरक्षा दीवार बनायी जा रही है। कुछ हिस्सा बन चुका है, उस पर आपदा की कहानी चित्रों के माध्यम से दर्शायी गयी है। साथ ही भगवान शिव के सभी अवतारों को सही दर्शाया गया है। उसके बाद हम लोग फिर मंदिर के पास आ गए। कुछ देर कुछ फोटो खींची, फिर होटल चले गए। वहां पर नाश्ता तैयार था। नाश्ता किया और होटल से विदा ली।
अब तक दोपहर के करीब 12:15 बज चुके थे। हम ने गौरीकुंड के लिए उतरना शुरू किया। मौसम भी बदलने लग गया था। सुबह धूप थी और अब आसमान में बादल छा गए थे। कुछ देर पहले जो पहाड़ियां दिख रहीं थी वो कोहरे की ओढ़ में आ गयीं थी। पूरी केदारघाटी में कोहरा लग गया था। हेलीकाप्टर सेवा मौसम की वजह से बंद हो गयी थी। हम लोग अब वापस आने लगे। 2 किमी आये थे कि बारिश शुरू हो गयी। शुरू में बारिश हल्की-हल्की हो रही थी पर बड़ी लिंचोली के पास से बहुत तेज हो गयी थी। देवेंद्र भैजी के पैरों में तेज दर्द हो रहा था और अब मेरे पैरों में भी हल्का-हल्का दर्द हो रहा था। तो हम ने वहां पर स्वास्थ्य शिविर (सरकार द्वारा संचालित) से दवाई ली। फिर देवेंद्र भेजी ने दवाई ली तो उनको आराम मिला और वो चलने लगे। तेज बारिश में बहुत से लोग रुक गए थे, किन्तु हम लोग आगे बढ़ते रहे। हम वापस आते समय भीमबली पर रुके। वहां पर हल्का नाश्ता किया और चाय पी, बारिश अभी भी हो रही थी।
भीमबली पर कुछ देर रुकने के बाद हमने फिर से गौरीकुंड के लिए उतरना शुरू किया। बारिश भी जारी थी। धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। फिर जंगलचट्टी पहुँच गए। वहां पर कुछ देर रुके और फिर आगे बढ़ने लगे। जंगलचट्टी से आगे फिर हम लोग छौड़ी पर रुके, वहां पर चाय पी। वहां से गौरीकुंड 2.50 किमी दूर था। कुछ देर आराम करने के बाद हम लोग गौरीकुंड के रास्ते पर आगे बढ़ने लगे। धीरे-धीरे चलने के बाद लगभग 6:30 बजे हम लोग गौरीकुंड पहुंच गए। वहां पर काफी श्रद्धालु खड़े थे, जो कि सोनप्रयाग तक जाने के लिए टैक्सी का इंतजार कर रहे थे। हम लोग भी इंतजार करने लगे, पर जैसी ही कोई टैक्सी आती वो झठ से भर जाती और शाम ढलने वाली थी जिसकी वजह से गाड़ी नहीं आ रही थी। लगभग 1 घंटे तक इंतजार करने के बाद हम ने अपने उस्ताद जी को फोन किया कि वो पुलिस वालों से निवेदन करके गाड़ी लेकर आ जाएं। कुछ देर बाद उनका फ़ोन आया कि उन्होंने पुलिस से बात की तो उन्होंने जाने की अनुमति दे दी है। फिर 10 मिनट में वो गौरीकुंड पहुँच गए। फिर हम लोग गाड़ी में बैठे और सोनप्रयाग की ओर बढ़ गए।
हम लोगों को उस दिन रात्रि विश्राम के लिए सीतापुर रुकना था। हम लोग 8 बजे के करीब होटल जे. पी. जी. पैलेस पहुंचे। अपने कमरे के बारे में जानकारी ली और फिर कमरे में पहुँच गए। बहुत थके हुए थे तो हम ने होटल स्टाफ से खाना कमरे में ही लाने को बोल दिया था। केदारनाथ से गौरीकुंड आते समय बारिश हो रही थी, जिस कारण हम लोग थोड़ा बहुत भीग भी गए थे। फ्रेस होकर फिर कपडे बदले।
फिर मैंने ऊखीमठ में रहने वाली अध्यापिका/कवयित्री कविता भट्ट दीदी जी को फ़ोन किया, क्योंकि मैंने उन्हें कहा था कि वापस जाते हुए उनसे मिलकर जाऊंगा। तो उन्हें बताया कि कल दिन में मस्तूरा/चोपता जाते हुए आपसे मुलाकात करूँगा। फिर अपने घर पर भी फोन पर जानकारी दी कि हम लोग बाबा केदार के दर्शन करके वापस आ चुके हैं। क्योंकि केदारनाथ से गौरीकुंड वाले रास्ते पर मोबाइल नेटवर्क न होने की वजह से किसी से भी सम्पर्क नहीं हो पाया था।
लगभग 9:30 बजे खाना आ गया। फिर हम लोगों ने खाना खाया और कुछ देर बातचीत करने के बाद सो गए। बहुत थके हुए थे तो नींद भी झठ से आ गई। सुबह उठे तो 7:00 बज चुके थे। हमारे उस्ताद जी सुरेंद्र जी ने हमें जगाया था। फिर हम तीनों एक-एक करके नहाने गए और तैयार हो गए। पी. एस. नेगी जी का फोन आया कि कब तक मस्तूरा आ रहे हो? तो उनको बताया कि दोपहर तक पहुंच जायेगे। कुछ देर उखीमठ में रुकना है। फिर होटल से हम लोग निकल पड़े। सीतापुर से आगे फाटा के पास हम रुके और एक छोटे से होटल पर हम ने चाय पी। फिर कुछ देर रुकने के बाद हम लोग आगे गुप्तकाशी की और चल पड़े। गुप्तकाशी पर रुके और वहां पर हमने नाश्ता किया। कुछ देर रुकने के बाद हम लोग उखीमठ की और चल पड़े।
गुप्तकाशी से कुंड पहुंचे और फिर वहां से उखीमठ के लिए सड़क जाती है। उखीमठ पहुंचकर मैंने श्रीमती कविता भट्ट दीदी जी को फ़ोन किया कि कहाँ पर आना है? तो उन्होंने अपने घर के पास का एड्रेस दिया। फिर हम लोग वहां पर पहुंचे। वहां पर उनके पति श्री भट्ट जी हमें लेने के लिए आये। देवेंद्र भैजी और सुरेंद्र कुमार जी गाड़ी में ही रुके गए। बोले कि हम लोग यहीं पर आराम करते हैं, आप मिलकर आ जाओ। क्योंकि देवेंद्र भैजी को चलने में कुछ दिक्कत सी हो रही थी और दीदी जी का घर सड़क से थोड़ा सा नीचे उतरकर था। फिर मैं कविता भट्ट दीदी जी के घर पहुंचा। वहां पर उनके ससुरजी और सासु जी थी थे। उनको प्रणाम किया। फिर दीदी जी और उनकी बेटी भी आयी और उनसे भी मुलाकात हुई। फिर दीदी जी चाय और पकोड़े लेकर आयी। फिर बातचीत शुरू हो गई। मैं पहली बार उनसे मिला था। किंतु ऐसा लग रहा था कि मैं पहले भी उनसे मिल चुका हूँ। मैंने दीदी जी को अपनी पहली गढ़वाली पुस्तक 'ज्यू त ब्वनु च' भेंट स्वरुप दी। लगभग आधा घंटा वहां पर रुकने के बाद मैंने दीदी जी और परिवार ये कहते हुए विदा ली कि फिर कभी आप लोगों से मिलने जरूर आऊंगा। वो तो कह रहे थे खाना खा कर जाना। पर हम लोगों को मस्तूरा में नेगी जी के रिसोर्ट में जाना था। फिर उनके पतिदेव मुझे सड़क तक छोड़ने आये।
फिर हम लोग उखीमठ से आगे मस्तूरा के लिए चल पड़े। लगभग 8 किमी के बाद मस्तूरा आ गया। वहां पर नेगी जी हम लोगों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। नेगी जी के रेसॉर्ट को देखकर बहुत अच्छा लगा। उन्होंने अभी 15 मई 2019 से ही इसे शुरू किया है। कुछ देर में चाय आ गई और हम सब लोगों ने चाय पी और फिर वो हम लोगों को अपना रेसॉर्ट दिखाने लगे। बाहर से रेसॉर्ट जितना अच्छा लग रहा था अंदर से उसके मुकाबले और भी ज्यादा अच्छा था। पहाड़ में इतने अच्छे होटल बहुत ही कम होते हैं। फिर उन्होंने बताया कि इस जगह से प्रसिद्ध देवरियाताल मात्र 3.50 किमी है। यहाँ पर 1 किमी की चढ़ाई वाले रास्ते से सारी गाँव तक जा सकते हैं। यदि सड़क से जायंगे तो करीब 20 किमी घूमकर सारी गाँव तक जा सकते हैं। वहां से 2.50 किमी की दूरी पर देवरियाताल है। जहाँ पर बहुत से पर्यटक आते रहते हैं।
मस्तूरा से चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला का नजारा साफ दिखाई देता है। फिर नेगी जी ने सब जानकारी हमें दी। देवेंद्र भैजी जो कि नॉर्थ फाइंडर्स (www.northfinders.com) के संचालक हैं ने नेगी जी को बोला कि वो आगे से यहाँ पर पर्यटकों को जरूर भेजेंगे और इस जगह को प्रचारित करेंगे। क्योंकि हमारा प्रयास है कि जन-जन तक उत्तराखंड के नए पर्यटक स्थलों के बारे में बताएं। फिर रेसॉर्ट की छत से प्रकृति का सुंदर नजारा देखा। जो कि बहुत ही आकर्षक था। तब तक दोपहर का खाना तैयार हो गया था। नेगी जी के स्टाफ ने टेबल पर खाना लगा दिया था। हमें खाना खाने के लिए बुलाया। फिर हम सभी ने एक साथ बैठकर खाना खाया। बहुत ही स्वादिष्ट खाना था। खाना खाने के बाद फिर हम लोग बातचीत करने लगे। फिर चाय आ गई। चाय पीने के बाद हम लोगों ने नेगी जी से विदा ली और पौड़ी के लिए निकल पड़े।
कुंड-अगस्त्यमुनि-रुद्रप्रयाग-श्रीनगर होते हुए हम लोग लगभग 7:45 बजे पौड़ी पहुंच गए। वहां पर होटल उमेश में रुके। रात को लगभग 9:00 बजे खाना खाया। फिर 10:00 बजे तक सो गए। सुबह उठे तो बाहर बारिश हो रही थी। हम लोगों को आज खिर्सू जाना था और फिर वहां से वापस दिल्ली। 7:00 बजे नहा धोकर तैयार हुए और होटल से 8:00 बजे खिर्सू के लिए निकल पड़े। जो कि पौड़ी से लगभग 18 किमी दूर है। करीब 9:00 बजे हम लोग खिर्सू पहुंचे। बारिश जो कि पहले रुक गई थी फिर से हल्की-हल्की होने लगी। खिर्सू बहुत ही अच्छी जगह है। हम सब पहली बार वहाँ पर गए थे। GMVN के होटल में जाकर हमने वहां सी जानकारी ली और फिर हम वापस बाजार में आ गए। वहां पर नास्ता किया। फिर हम लोग दिल्ली के लिए रवाना हो गए। चोपट्टा से हमने बुरांश और नींबू का जूस खरीदा जो कि शुद्ध और जैविक है। फिर हम लोग सतपुली होते हुए गुमखाल पहुंचे। वहां पर रुककर दोपहर का भोजन किया। कुछ देर रुकने के बाद दिल्ली के लिए निकल पड़े। दुगड्डा-कोटद्वार-नजीबाबाद-बिजनौर-मेरठ-मुरादनगर होते हुए लगभग 6:00 बजे हम लोग इंदिरापुरम पहुंचे। जहां पर मैं निवास करता हूँ। मुझे घर पर छोड़कर देवेंद्र भैजी और सुरेंद्र कुमार जी दिल्ली अपने घर के लिए निकल पड़े। इस तरह से 5 दिन का मेरा सुहाना सा सफर पूर्ण हुआ। यह सफर मुझे हमेशा याद रहेगा। जय बाबा केदारनाथ...

- अनूप सिंह रावत
11 जुलाई 2019

Wednesday, March 28, 2018

About Anoop Rawat by Bhishma Kukreti Ji


Anoop Singh Rawat: A Promising Garhwali Poet and a Blogger
(गढ़वाल, उत्तराखंड, हिमालय से गढ़वाली कविता क्रमगत इतिहास भाग -236)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, Part ::)
By: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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Anoop Singh Rawat is one of the promising young Garhwali poets interested in taking Garhwali poetry on its zenith.
Anoop knows that in modern time, internet is one the most promising medium for promoting small population spoken language as Garhwali. That is the reason he started his own blog (Meru Muluk Meru Paran. www.iamrawatji.blogspot.in).
Anoop Rawat was born in Gween Malla, Khatali, Bironkhal of Pauri Garhwal in 1989. Anoop Rawat is post graduate and interested in digital media.

Humanity, Social reforms and Garhwal are major concerns for young Garhwali poet Anoop. He discusses Chakbandi, foeticide, development and many more subjects as love, philosophy, spirituality, patriotism.
हे गितांग दिदा जरा चकबंदी कु गीत लगै दे poem shows his concern for social and agriculture reforms in Garhwal hills.

His one of the best social concern poems is about foeticide -
कन्या भ्रूण हत्या पर कुछ पंक्तियाँ (गढ़वाली कविता भाग )

आणि दे वीं ईं दुनिया मा, जींणी दे वीं ईं दुनिया मा
क्या चा वींकु दोष ज्वा ह्व़े व बेटी जात
कुछ त डैर वे बिधाता से राखी ले मनख्यात

आज की दुनिया मा बेटी बेटा बराबर चा
ध्यान से देख फर्क नीचा कुछ भी द्वियु मा
टक्क लगे सुणी ले अनूप रावत कि या बात
क्या चा वींकु दोष ज्वा ह्व़े व बेटी जात
कुछ त डेर वे बिधाता से राखी ले मनख्यात

तीलू, रामी, गौरा ह्वेनी बड़ी-२ नारी
जौन करी काम यनु दुनिया दे तारी
छाया सभ्या यु भी रे मनखी नारी जात
क्या चा वींकु दोष ज्वा ह्व़े व बेटी जात
कुछ त डेर वे बिधाता से राखी ले मनख्यात

Anoop also creates humor and satire in his Garhwali poetry as under –
उन त मि
नौन्युं देखि
भारी सरमांदू छौं
पर कबि फेसबुक मा
जरा सि चैट कै देंदु…

Anoop Rawat uses lyrics, poems and Ghzals for his illustration.
It is clearly visible effects of Salani Garhwali dialects in poems by Anoop Rawat.
Anoop uses old Garhwali phrases (खैरी खांदा खांदा) and new phrases (फूल माला रिबन कटे उद्घाटन ह्वे गे) too for illustrating his poems.
There are mostly all types of images in the poems by Anoop. His uses of symbols make perfect images.
Poetry critic Dr. Manjula Dhoundiyal claims that Anoop has tremendous potentiality for Garhwali poetry world.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2017

Thursday, November 16, 2017

चकबंदी - एक उम्मीद


उत्तर भारत के हिमालयी राज्यों में से एक उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है. यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता जितनी खूबसूरत है, ठीक यहाँ का जीवन उतना ही कठिन है. क्योंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ जीवन यापन आसान नहीं है. उत्तराखंड राज्य 9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया था, जिसकी माँग बहुत समय से हो रही थी. इससे पूर्व यह पर्वतीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश राज्य का एक अंग था. यहाँ के निवासियों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने से से यहाँ का विकास होगा और लोगों के जीवन में खुशियों की बौछार होगी. किंतु राज्य बनने के 17 वर्षों के बाद भी, अभी भी स्थिति करीब-२ वैसी ही बनी हुई है. जिसका कारण अभी तक की सरकारों का उदासीन रवैया रहा है. यहाँ की सरकारें राज्य को ऊर्जा प्रदेश, पर्यटन प्रदेश बनाने पर ही लगे हुए हैं. कोई भी यहाँ के आजीविका के मुख्य स्रोत कृषि (किसानी) पर ध्यान नहीं दे रहा है. कभी कभार कोई नेता चुनाओं के मध्यनजर इसकी बात करता है और चकबंदी की बातें करके वोट बटोर लेता है किंतु चुनाव उपरांत चकबंदी को भूल जाते हैं.

उत्तराखंड में आजीविका का मुख्य स्रोत प्रारम्भ से ही खेतीबाड़ी रहा है. इसके अलावा सेना और अर्धसैनिक बलों में भी यहाँ के युवाओं को रोजगार के साथ-२ देश की सेवा करने का मौका रहता है. किंतु समय के साथ-२ कृषि क्षेत्र में यहाँ के लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है क्योंकि जंगली जानवर खेती को बहुत नुकसान पंहुचा रहें हैं. जिससे लोग अब खेती से लगातार दूर हो रहे हैं. पारम्परिक खेती में होते नुकसान और सरकारी नौकरी में चयन न होने की स्तिथि में यहाँ से लोग लगातार पलायन कर रहे हैं. क्योकि जब लोगों के पास रोजगार का कोई साधन नहीं होता है तो उनको पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है. जिसमें यहाँ के लचर शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं पूरा साथ दे रहीं हैं और पलायन करने पर मजबूर कर रही हैं. अब खेती को पुनः बचाने और लोगों के पारम्परिक रोजगार को बचाने का एकमात्र उपाय चकबंदी ही है. जिसकी मांग राज्य बनने से पूर्व से ही लगातार हो रही है.

उत्तराखंड राज्य का 86% हिस्सा पर्वतीय है और 65% जंगलों से ढका हुआ है. यहाँ पर खेती सीढ़ीदार खेतों पर होती है. यहाँ के खेत बिखरे हुए हैं और परिवारों के विभाजन से एक परिवार की खेती 10 से 20 जगहों पर हैं. जिससे खेती करने में ज्यादा श्रम और लागत आती है. खेती तब ही अच्छी हो सकती है जब खेत एक सामने हों और इसका एकमात्र उपाय चकबंदी है. एक जगह चक हो जाने से यहाँ श्रम भी बचेगा और लोग अपनी योजना के अनुसार खेती कर सकते हैं. यहाँ के खेत उपजाऊ तो हैं किंतु सही से भूमि बंदोबस्त न होने के कारण किसानों को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

अगर उत्तराखंड के पर्वतीय भू-भाग में चकबंदी की जाती है तो फिर यहाँ के किसान भी आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से होने वाली खेती को आजमा सकते हैं और इसी भूमि पर अच्छी खेती कर सकते हैं. चकबंदी से खेती - बाड़ी में ही स्वरोजगार उत्पन्न हो सकता है. क्योंकि यहाँ की जमीन ही यहाँ का स्थाई रोजगार है. यहाँ के पारंपरिक रोजगार जो की बंद होने के कगार पर हैं उनको भी पुनः खड़ा किया जा सकता है. क्योंकि खेती से जुड़े बहुत रोजगार अब बंद हो रहे हैं, खेती में इस्तेमाल होने वाले औजारों का निर्माण करने वाले लुहार (शिल्पी) या फिर रिंगाल से वस्तुएं बनाने वाले "रुड्या" हों, इनका रोजगार पुनः शुरू हो सकता है. साथ ही यदि यहाँ से पलायन रुक जाता है तो कुटीर शिल्प, धातु शिल्प, ताम्र शिल्प, काष्ठ शिल्प, वस्त्र शिल्प, पशुपालन आदि से जुड़े लोगों को भी रोजगार मिल जायेगा, जो कि पलायन होने से लगातार गिरता जा रहा है. सरकारी योजनाओं के साथ यदि पारंपरिक रोजगार भी रहेगा तो यहाँ के लोगों का जीवन खुशहाल हो सकता है और पलायन और बेरोजगारी को रोका जा सकता है.

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में चकबंदी से खुशहाली आ सकती है. यदि यहाँ की सरकार यहाँ पर भूमि बंदोबस्त करती है तो हरित क्रांति को सच में उत्तराखंड के इस भू-भाग पर नया आयाम मिल सकता है. चकबंदी हो जाने से कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्र के लोग बहुत मेहनती होते हैं और उनको यहीं पर उनकी मेहनत का अच्छा परिणाम मिल सकता है. हर किसी परिवार का अपना चक हो जाने ये कृषि उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है, खेती से ही यहाँ के प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाया जा सकता है. कृषि व्यवस्था को दुरुस्त करने, पलायन और बेरोजगारी को रोकने के लिए चकबंदी एक उम्मीद है.

गरीब क्रांति अभियान (उत्तराखंड) लगातार चकबंदी के प्रति लोगों को जागरूक कर रहा है और समस्त उत्तराखंड में चकबंदी जागर यात्रा और गोष्ठियों का आयोजन कर रहा है. यदि उत्तराखंड सरकार अपने स्तर पर लोगों में चकबंदी की जागरूकता और अनिवार्य चकबंदी करवाती है तो एक दिन उत्तराखंड जरूर कृषि के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकता है. चकबंदी से कृषि और बागवानी में कैसे आगे बढ़ा जा सकता है इसका उदहारण हमारा पडोसी राज्य हिमाचल प्रदेश है, जहाँ पर उत्तराखंड की ही तरह परिस्तिथि है. चकबंदी जो जाने से यहाँ के किसान भी जड़ी-बूटी, पुष्पोत्पादन, सुगंध पादन, मसाला उत्पादन की राह पर आगे बढ़ सकता है. एक सामने चक हो जाने से साथ ही लोग मौनपालन, पशुपालन, मत्स्यपालन, वानिकी आदि क्षेत्रों में भी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं. चकबंदी यहाँ खुशहाली की उम्मीद नजर आती है. चकबंदी से स्वालंबन के धारणा को भी जीवित किया जा सकता है और पहाड़ एक बार फिर सम्पन्नता की राह पर निकल पड़ेगा। इसलिए आज के समय की मांग चकबंदी है, जिसके जरिए भूमि सुधार करके उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्से में खुशहाली आएगी.

दिनांक: 16 नवम्बर 2017
अनूप सिंह रावत (चकबंदी समर्थक)
ग्राम व पो. ओ. ग्वीन मल्ला
विकासखंड - बीरोंखाल (खाटली)
जिला - पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखंड – 246276
rawat28anu@gmail.com

Thursday, March 31, 2016

लेख: पलायन अभिशाप, चकबंदी वरदान


लेख: पलायन अभिशाप, चकबंदी वरदान

उत्तराखंड जो कि भारत देश का एक पर्वतीय राज्य है, भौगोलिक दृष्टिकोण से एक विषम परिस्तिथियों वाला प्रदेश है. यहाँ का पहाड़ी क्षेत्र जितना खूबसूरत है, उसके विपरीत यहाँ का जीवन उतना ही कठिन है. यहाँ का प्रमुख व्यवसाय कृषि रहा है. जिसमे कि अब लगातार गिरावट आ रही है. पहाड़ में रोजगार पाने का मुख्य जरिया सेना है. यहाँ के ज्यादातर युवा फ़ौज में जाते हैं और रोजगार के साथ-२ देश सेवा में अपना अमूल्य योगदान देते हैं. यहाँ पर विद्यालयी शिक्षा के उपरांत उच्चतम शिक्षा के लिए छात्रों को बहुत दूर-२ जाना पड़ता है. क्योंकि उच्चतम शिक्षा के यहाँ सीमित ही संस्थान हैं. जिसमे से ज्यादातर शहरों में हैं. जिसके कारण बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए यहाँ से बाहर ले जाते हैं. जो युवा यहीं शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनको भी यहाँ रोजगार की समस्या से जूझना पड़ता है, और वो भी रोजगार की तलाश में यहाँ से पलायन कर अन्य राज्यों की और रूख करते हैं. यही कारण है कि उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्सों से आज लगातार पलायन हो रहा है और इसी तरह पलायन होता रहा तो निश्चित ही यह क्षेत्र एक दिन सूना हो जायेगा. इसकी एक झलक बहुत से गांवों में देखी जा सकती है. पलायन का एक कारण यह भी है कि वर्तमान समय में लोग भौतिक सुबिधाओं के लिए भी पहाड़ से दूर जा रहे हैं, जिनका का यहाँ पर अभाव है. पलायन उत्तराखंड के लिए एक अभिशाप की तरह लगातार फन फैला रहा है. अगर अभी इस विषय पर सोच विचार न किया गया तो आने वाले समय में उत्तराखंड में पहाड़ तो रहेंगे किंतु पहाड़ी नहीं. क्योंकि बहुत से लोग जो कि रोजगार के लिए इन क्षेत्रों में आये थे वो यहाँ बस भी गए हैं, जिनमें नेपाली, बिहारी और उड़िया लोग ज्यादातर शामिल हैं. पलायन के कारण यहाँ से लोग लगातार कम हो रहे हैं और यहाँ की सरकार कुछ भी नहीं कर रही है. अब समाजसेवी ही इस और ध्यान दे रहें हैं और लोगों को और सरकार को जागरूक कर रहें हैं. पलायन के कारण यहाँ की संस्कृति, रीति-रिवाज और नैतिक मूल्यों का भी ह्रास हो रहा है. जिस उत्तराखंड की मांग एक अलग सशक्त और समृद्ध राज्य के लिए की गई थी आज वह पलायन की मार झेल रहा है और यहाँ के नेता जो कि स्वयं को लोगों का मसीहा कहते हैं, राजनीति के नशे में डूबे हुए हैं. अभी भी वक़्त है कि यहाँ के प्रमुख व्यवसाय कृषि पर ध्यान दिया जाय और पलायन को रोका जाय.
पलायन को रोकने के लिए चकबंदी एक वरदान साबित हो सकती है. इसका उदाहरण हिमाचल प्रदेश हमारे सामने है. जो कि उत्तराखंड की भांति समान परिस्तिथियों वाला प्रदेश है. चकबंदी के कारण वहां पर खेती में लोग अपना रोजगार स्वयं पैदा करते हैं और खेती से ही अपने घर-परिवार आसानी से चला रहे हैं. “गरीब क्रांति अभियान” एक ऐसा ही अभियान है, जिसका प्रयास है कि उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्से में चकबंदी कर यहाँ के लोगों को पुनः खेती की ओर अग्रसर किया जाए और उनको यहीं पर रोजगार प्राप्त हो सके. गणेश सिंह “गरीब” जी के नेतृत्व में युवा कपिल डोभाल जी और साथियों ने उत्तराखंड में भी चकबंदी करवाने की ठानी है और उनके साथ इस कार्य में बहुत से लोग जुड़े हुए हैं. सभी लोग लगातार जन-जागरण के काम में लगे हैं और जगह-२ अभियान को बढ़ा रहे हैं. ताकि लोग जागरूक हों और चकबंदी के लिए सरकार पर भी दबाब बन सके. पिछले कुछ समय से गरीब जी का प्रयास रंग ला रहा है और सरकार भी इस विषय पर गंभीर नजर आ रही है. सरकार ने इसके लिए “भूमि सुधार” नाम से कमेटी का गठन किया है और चकबंदी का ड्राफ्ट भी बना लिया है, जिसमे गणेश सिंह “गरीब” जी भी उपाध्यक्ष हैं. और “गरीब क्रांति अभियान” की टीम सरकार पर लगातार दबाब बनाये हुई है. चकबंदी से पहाड़ में एक बार फिर खेत लह-लहा उठेंगे और यहाँ पर से पलायन पर रोक लगेगी. क्योंकि फिर यहाँ के लोगों को यहीं पर रोजगार प्राप्त हो सकेगा और वो यहीं पर सुखी जीवन यापन कर पाएंगे. जहाँ पलायन यहाँ के लिए अभिशाप बना है तो वहीं दूसरी और चकबंदी वरदान साबित होगी...

नोट: चकबंदी से जुडी अधिक जानकारी के लिए गरीब क्रांति अभियान की वेबसाइट www.garibkranti.in पर देखें.

- अनूप सिंह रावत (चकबंदी समर्थक)
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
E-mail: rawat28anu@gmail.com

गैरसैंण - यात्रा वृत्तान्त

गैरसैंण - यात्रा वृत्तान्त
लेख – अनूप सिंह रावत

इस संस्मरण में गैरसैंण यात्रा का सार लिख रहा हूँ। चकबंदी दिवस, जो कि 1 मार्च 2016 को होना था, उसके लिए दिल्ली से हम लोग गए थे। उसी का विवरण लिखने का एक छोटा सा प्रयास है।

गैरसैंण जाने का कार्यक्रम पहले ही तय हो गया था। जो कि सोशल मीडिया पर बात करते हुए तय किया गया था। मैं बाकी मित्रों का अपने घर के पास राष्ट्रीय राजमार्ग 24 (काला पत्थर) पर इन्तजार कर रहा था। रात करीब 10:30 बजे राकेश रावत भाई जी भी मुझे मिले और हम दोनों बाकी मित्रों का इन्तजार करने लगे। गाड़ी काफी देर में आई और रात्रि 12 बजे पहुंची। गाड़ी में बाकी सभी लोग द्वारका से साथ में आए। जिनमें विकास ध्यानी, अनूप पटवाल, दिनेश चतुर्वेदी, अनोप नेगी और शंकर ढौंडियाल जी थे। विकास ध्यानी जी से ही मैं इससे पहले मिला था, अन्य लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से ही जानता था। हम लोग गाड़ी में सवार होकर आगे बढ़ चले और साथ में एक दूसरे से जान पहचान व बातें होने लगी। गाड़ी हरियाणा के रोहतक जिले के रहने वाले पंडित जी चला रहे थे। मुरादाबाद से पहले हम लोगों ने गाड़ी रोकी और चाय पी। जैसे जैसे हम लोग आगे बढ़ते रहे रास्ते में कुछ जगह कोहरा भी लगा था। ठाकुरद्वारा के पास पहुँच कर ड्राईवर ने गाड़ी रोक ली और जोड़ी देर आराम करने को कहा। वहां पर थोड़ी देर रुकने के बाद हम लोग पुनः आगे चलने लगे। रामनगर में हमारे साथी, जो कि दूसरी गाड़ी से जा रहे थे हमारा इन्तजार कर रहे थे। जिनमें महाराष्ट्र से आये रविन्द्र कुंवर जी और नितिन पंवार जी थे। जो कि दिल्ली से जगमोहन जिज्ञासु जी के साथ थे। करीब सुबह 5:30 पर हम लोग रामनगर पहुंचे। वहां पर उनसे मुलाकात और जान पहचान हुयी। रविन्द्र जी पहली बार उत्तराखंड आए थे। जो की फ़ेसबुक के माध्यम से चकबंदी अभियान से जुड़े थे और काफी गढ़वाली भी सीख गए थे। उनसे मिलकर लग रहा था जैसे कि वह भी उत्तराखंड के ही मूलनिवासी हैं।
रामनगर में फ्रेश हुए और फिर चाय की चुस्कियों के साथ बातचीत का दौर आगे बढ़ रहा था। जिज्ञासु जी ने हमे गरीब क्रांति अभियान, 1 मार्च चकबंदी दिवस का बैनर दिया। जिसे हम लोगों ने अपनी गाड़ी पर लगा दिया। फिर हम लोग आगे के लिए रवाना हो गए। थोड़े आगे जाने पर बैनर उड़ने लगा, जिसे फिर से निकाल दिया और आगे फिर कहीं पर गाड़ी रोककर बांधने का तय हुआ। हम लोग मोहान के रास्ते भिक्यासैंण वाली सड़क के रास्ते गए। मोहान से कुछ आगे रुककर हम लोगों ने चाय पी और नाश्ता किया। अनूप पटवाल और शंकरशंकर ढौंडियाल भाई जी घर से बनी रोटी लाए थे। साथ में गाजर का हलवा भी था। वहां पर नाश्ता करने के बाद हम लोग आगे बढ़ चले। भिक्यासैंण पहुँच कर हम लोग दुकान से टेप खरीदकर लाए और बैनर को अपनी गाड़ी के आगे वाले हिस्से ( बोनट) पर चिपका दिया। ताकि वह अब फिर से निकले नहीं। बाजार में लोगों के साथ चकबंदी को लेकर बातचीत भी हुयी। काफी लोगों ने इस प्रयास को सराहा और कहा कि उत्तराखंड में अब चकबंदी ही एकमात्र उपाय है, जिससे यहाँ से पलायन भी रुकेगा और खेती-बाड़ी भी अच्छी होगी। वहीँ आगे के गांव और बाजारों में भी हम लोग चकबंदी जागरूकता अभियान चलाते हुए जा रहे थे। कुछ लोग काफी निराश लग रहे थे। उनकी समस्या यह थी कि खेती को जंगली जानवर नुकसान पहुंचा रहे हैं और जो कुछ वो उनसे बचा भी पाते हैं तो उनको उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। हम सब लोगों को साथ में ढांढस भी बंधा रहे थे और उनको चकबंदी दिवस में शामिल होने का न्योता भी दे रहे थे। ताकि वो लोग वहां आकर अपनी समस्याओं को बता सके और सरकार तक उनकी बात को हम पहुंचा सके।
आगे चलते-2 हम लोग महलचोरी पहुंचे, जो की गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ता है। पुलिस भी वहां पर चेकिंग के लिए तैनात थी। हम लोगों को भी रोका गया और फिर पूछताछ के बाद आगे बढ़ गए। वहां से फिर हम लोग गैरसैंण पहुँच गए। पहुँचते-2 करीब 1 बज गया था। हम लोग श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम पहुंचे। कुलदीप भाई जी के साथ हम लोग ऑफिस से आश्रम में गए. जहाँ पर हम लोगों के साथी पहले ही पहुँच चुके थे। कपिल डोभाल जी और अन्य लोगों से मुलाकात हुई और जान-पहचान भी। क्योंकि इससे पूर्व हम लोग सिर्फ फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर ही बातचीत हुई थी। फिर सब लोग तरोताज़ा हुए और फिर खाना खाकर शाम की रैली की तैयारी होने लगी। मौसम भी काफी खुशनुमा हो गया था। आसमान में बादल छा गए थे और हल्की-2 बूंदाबादी हो रही थी। थोड़ी देर में चकबंदी के प्रणेता गणेश सिंह "गरीब" जी और उनकी धर्मपत्नी भी पहुँच गए। शाम को करीब 4 बजे सब लोग ढोल-दमो-मसूबाज के साथ वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जी के स्मारक के पास एकत्रित हुए और फिर रैली आरंभ हो गयी। साथ ही हम लोग बाज़ार में चकबंदी की जानकारी से सम्बंधित पोस्टर भी चस्पा कर रहे थे और चकबंदी के फायदे और जानकारी के पर्चे भी बाँट रहे थे। पूरे गैरसैंण बाजार में चकबंदी की गूँज उठ रही थी। रैली आगे बढ़ते हुए ग्राउंड में पहुंची और फिर जोरदार बारिश शुरू हो गयी। सभी लोग मंच की छत के नीचे पहुंचे और जब तक बारिश बंद हुई तब तक ढोल-दमो में नाच-गाना चलता रहा। फिर रैली बाजार से होते हुए वापिस आश्रम में आकर समाप्त हुई। अब रात्रि हो चली थी और सब लोग हॉल में एकत्रित हुए और सब अपना-2 परिचय देने लगे। इस तरह अलग-2 जगहों से आए हुए लोगों से पहचान हुई और सब अपने-2 बारे में और काम के विषय में जानकारी देने लगे। साथ ली चकबंदी पर सभी ने अपने विचार रखे। फिर थोड़ी देर में खाने के लिए बुलावा आ गया, सभी लोग भोजनशाला पहुँच गए और खाना खाने लगे और आश्रम के नियम के हिसाब से खाना खा कर सभी लोगों ने अपने-२ बर्तन वापस धो कर रख दिए. खाना खा कर पुनः सभी लोग हॉल में पहुँच गए और बातचीत का दौर आगे बढ़ा, और सुबह की भी तैयारी पूरी हो गयी थी. फिर सभी लोग सो गए.
सुबह सभी समय पर उठ कर तैयारी करने लगे. हम लोग भी तैयारी करने लगे और सुबह-२ मैं (अनूप रावत), विकास ध्यानी, अनोप नेगी, शंकर ढौंडियाल और राकेश रावत भाई टहलने निकल गए. आश्रम से २ किमी दूर एक छोटी सी नदी थी, उस और निकल पड़े. धीरे-२ सुबह की ठंडी हवा का मज़ा लेते हुए हम सड़क के रास्ते वहां पहुँच गए. पानी काफी ठंडा था, हम लोग उधर से ही हाथ-मुंह धोकर आये. साथ में कुछ यादगार पल भी कैमरे में कैद किये. फिर हम लोग वापस आश्रम पहुंचे. सब लोग तैयार थे और सभी पहले नास्ते के लिए भोजनशाला पहुंचे और फिर सब अलग-२ गाड़ियों से आयोजन स्थल पर पहुंचे. फिर वहां पहुँच कर तैयारी शुरु हो गयी. हम लोग मंच के पास और मैदान के चारों और चकबंदी और गरीब क्रांति अभियान के पोस्टर और बैनर लगाने लगे. फिर धीरे-२ लोग भी पहुँचने लगे. आयोजन स्थल पर कृषि विभाग की प्रदर्शनी लगी हुयी थी. सुन्द्रियाल प्रोडक्शन और गैरसैण फ्रेश ने भी अपने-२ स्टाल लगा रखे थे. जिनमे उत्तराखंडी खाद्य सामग्री उपलब्ध थी. जो कि एक आकर्षण के केंद्र थे. हम सभी लोग चकबंदी और कृषि मंत्री हरक सिंह रावत का इंतजार करने लगे, जो की चक्बदी दिवस के मुख्य अतिथि थे. किंतु जब हमे पता चला की वो नहीं आ रहे हैं तो बहुत ही बुरा लगा. उन्होंने चकबंदी विधेयक के अध्यक्ष श्री केदार सिंह रावत जी को भेज दिया था. उनके साथ कोंग्रेस के प्रवक्ता भी आये थे. अतिथियों में गैरसैण ब्लॉक प्रमुख श्रीमती बिष्ट जी भी पहुंची. साथ में महाविद्यालय के अध्यक्ष भी थे. मंच पर महाराष्ट्र से आये श्री रविन्द्र कुंवर जी और नितिन पंवार जी, गरीब क्रांति की प्रणेता श्री गणेश सिंह “गरीब” जी विराजमान थे. फिर कार्यक्रम शुरू हो गया. सबसे पहले गरीब क्रांति अभियान की सदस्य नूतन पंत जी ने सबको बैच लगाकर स्वागत किया. मंच का संचालन श्री एल.मोहन कोठियाल जी कर रहे थे. कार्यक्रम का शुभारंभ गायिका सुनीता रावत ने चकबंदी गीत गाकर किया. फिर काफल ग्रुप के सदस्यों ने “पांडव नृत्य” प्रस्तुत किया. जिसमे कि छोटे-२ बच्चों ने अपनी कलाकारी से चार चाँद लगा दिए. फिर पास के ही गाँव की महिलायों ने सुंदर ‘चांचरी नृत्य’ प्रस्तुत किया. जिसमे की उत्तराखंड की संस्कृति साफ-२ झलक रही थी. इन प्रस्तुतियों ने सभी लोगों का मन मोह लिया.
फिर मंच पर आसीन लोग अपने-२ भाषण देने लगे. गणेश सिंह “गरीब” जी के भाषण ने लोगों में एक नयी उर्जा ला दी थी. जिसे मनीष सुद्रियाल, मंगल सिंह नेगी, तिवारी जी, विकास ध्यानी, अनूप पटवाल, कपिल डोभाल, अमित गुसाईं, कुलदीप नेगी और साथिओं ने आगे बढाया. महाराष्ट्र से आये रविन्द्र कुंवर जी ने अपना भाषण गढ़वाली से शुरू किया, जो कि सभी लोगों को हैरान करने वाला था. उन्होंने कहाँ कि उन्हें उत्तराखंड की पावन धरती से बहुत लगाव है और यहाँ खेती की अपार संभावनाएं है, जिसे चकबंदी एक नया स्वरुप दे सकती है. अंत में चकबंदी विधेयक के अध्यक्ष केदार सिंह रावत जी अपनी बात रखी और कहा की वो इस विधानसभा सत्र में मंत्री जी के माध्यम से सदन में रखेंगे. जो की पूरी तरह से तैयार है. इसी आश्वासन के साथ उन्होंने अपना भाषण समाप्त किया. फिर सभी लोगों को गरीब क्रांति अभियान का मोमेंटो देखर सम्मानिंत किया गया, सभी सदस्यों का मंचासीन अतिथियों के साथ एक सामूहिक फोटो लिया गया और चकबंदी दिवस का कार्यक्रम एक सफलता के साथ समाप्त हुआ. फिर सभी लोग एक दूसरे के साथ तस्वीर लेने लगे और इस मौके को यादगार बनाने लगे.
कार्यक्रम समाप्ति के बाद हम लोग सब सामान एकत्रित कर आश्रम की और चल दिए. रास्ते में स्थित गैरसैण फ्रेस कंपनी में पहुंचे और उनसे उसकी जानकारी लेने लगे. श्री रावतजी ने हमे अपनी सभी मशीनों से परिचित करवाया और बताया कि किस तरह से पहाड़ में स्वरोजगार शुरू किया जा सकता है. तब तक करीब ४ बज चुके थे. फिर हम लोगों ने गैरसैण घूमने का कार्यक्रम तय किया. हम लोगों के साथ कुलदीप नेगी, अमित गुसाईं और गैरसैण फ्रेस के रावतजी भी चल दिए. जो कि वहां के निवासी थे और हम लोगों के लिए एक गाइड की तरह सभी जगहों से अवगत कराने लगे. हम लोग गैरसैण से १७ किमी दूर बन रहे विधानसभा भवन की और रवाना हुए. वहां से ठीक सामने दूधातोली पर्वत दिखाई दे रहा था. उन्होंने बताया की इस पर्वत से रामगंगा, पुर्वी नयार और पश्चिमी नयार निकलती है. जो जी उत्तराखंड के किसानों के लिए एक वरदान हैं. फिर हम लोग विधानसभा के गेट पर पहुंचे और अंदर जाकर देखने के लिए आज्ञा मांगने लगे, किंतु हम लोगों को आज्ञा नहीं मिली. फिर कुलदीप भाई ने कहा कि २ किमी आगे हैलीपैड है, जहाँ से निर्माणाधीन पूरे विधानसभा भवन और गैरसैण को देखा जा सकता है. तो हम लोग हैलीपैड चल पड़े. वहां से नजारा देखने लायक था. पूरा गैरसैण और आस पास का क्षेत्र देखा जा सकता था. नजारा बहुत ही अच्छा था, और धीरे-२ शाम ढल रही थी जो कि पहाड़ों की सुन्दरता को और भी अधिक बढा रही थी. फिर हम लोगों कुछ तस्वीरे कैमरे में कैद की और वापस लौटने लगे. रात होने लगी थी और हल्की-२ ठंड भी, फिर हम लोग एक दुकान पर रुके जहाँ पर एक बोड़ी (बुजुर्ग महिला) और उनकी बहु जो की चाय की दुकान चलाकर अपना परिवार चला रहे थे. हम लोगों के लिए चाय बनाई और प्यार और आशीर्वाद दिया. फिर हम लोग आश्रम आ गए. फिर सब लोग गणेश “गरीब” जी और मंगल सिंह नेगी जी से मिले और वो सभी सदस्यों के साथ वार्ता करने लगे. चकबंदी अभियान को किस तरह सफल बनाया जाय और आगे की क्या रणनीति होगी इस पर चर्चा होती रही. फिर खाना खाने के लिए बुलावा आ गया और सब लोग खाने के लिए चल पड़े. खाने के बाद फिर चर्चा शुरू हुई. सभी लोग एक-२ कर अपनी-२ बात रखने लगे और रात्रि के करीब ११ बजे तक चर्चा जारी रही. फिर सब लोग सो गए.

सुबह सब लोग तैयार होने लगे और सभी एक-दूसरे से अगले कार्यक्रम तक विदाई लेने लगे और फिर मिलने का वादा कर अपने-२ गंतव्य की और रवाना हो गए. हम लोग भी अब वापस दिल्ली की और अग्रसर हो गए. हम लोग पहले ही तय कर चुके थे कि हरिद्वार के रास्ते जायेंगे. फिर हम लोग आदिबद्री मंदिर पहुंचे. जो कि पंच-बद्री में से एक है. वहां पर रुक कर हमने भगवान के दर्शन किए. पुजारी जी ने बताया कि यहाँ पर १६ मंदिर थे, जिनमे से अब १४ मंदिर ही बचें हैं. फिर वहां से हम लोग कर्णप्रयाग पहुंचे. वहां पर रुके नहीं और आगे गौचर बाजार में रूके. २ मार्च हो हमारे साथी अनूप पटवाल का जन्मदिन था. बाजार में रुककर हमने होटल में अनूप भाई का जन्मदिन मनाया और वहां पर सभी लोगों को केक बांटा. फिर हम लोग नास्ता कर आगे बढे. अलकनंदा नदी के किनारे-२ सड़क पर रुद्रप्रयाग-देवप्रयाग होते हुए हम लोग श्रीनगर पहुंचे. वहां से थोडा आगे कलियासौड़ जगह है. जहाँ पर माँ धारी देवी का मंदिर है. हम लोग वहां पर रुके, और मंदिर में पहुंचे. माँ धारी देवी के दर्शन किए और प्रार्थना की कि हम सभी लोगों के साथ-२ सभी प्रदेश वासियों पर अपनी कृपा रखें. माँ की मूर्ति बहुत ही आकर्षक और मनभावन थी. जिसे देखते रहने का मन कर रहा था. किंतु समय का अभाव भी था और हम लो दिल्ली भी पहुंचना था. वहां से हम लोग ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार पहुंचे. वहां पर हमारे एक मित्र कुंदन जी हमारा इंतजार कर रहे थे. हम लोग हरि की पैड़ी पहुंचे. जहाँ पर अर्ध-कुंभ के चलते बहुत भीड़ थी और शाम हो चली थी और गंगा आरती का वक्त हो चला था. फिर हम सभी ने गंगा-स्नान किया. पानी काफी ठंडा था. अनूप पटवाल और राकेश रावत भाई तैरकर दूसरी छोर गए. फिर मैं भी उनके पीछे तैरकर पार पहुँच गया. पानी में बहुत तेज बहाव था. फिर हम लोग स्नान कर बोतल में गंगा जल लेकर वापस गाड़ी की और चल दिए. जहाँ पर एक होटल में कुंदन जी ने हमे चाय और समोसे खिलाए. फिर हम लोग उनसे विदा लेकर दिल्ली रवाना हो गए. रात्रि के करीब १० बजे हम लोग गाजियाबाद पहुंचे. मैं (अनूप रावत) वहीँ पर उतर गया. क्योंकि वहां पर मुझे अपने चचेरे भाई के घर जाना था. सभी मित्रों से फिर मिलने का वादा कर मैं गाड़ी से उतर गया. फिर मैंने घर पहुँच कर सब साथियों को सूचित कर दिया. फिर राकेश रावत जी को उन्होंने उनके घर के समीप उतार दिया और बाकी लोग द्वारका पहुँच गए. फिर सब अपने-२ घर पहुँच चुके थे. फिर सोशल मीडिया के माध्यम से सभी ने अपने-२ घर पहुँचने की सूचना दी. इस के साथ ही यह सफल और सुंदर यात्रा समाप्त हुई...

Friday, February 13, 2015

लेख: पहाड़ और जीवन

शीर्षक : पहाड़ और जीवन
लेख : अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”

“पहाड़” शब्द का नाम सुनते ही मन मे तरह-२ की कल्पनाएं घर करने लगती हैं. पहाड़ के नाम से ही मन रोमांचित हो जाता है. मन में पहाड़ों की सुंदरता के ख्याल आने लगते हैं, वहां के हरे-भरे पेड़-पौधों और रंग-बिरंगे फूलों के चित्र मन में उमड़ने लगते हैं. जो कि मन को शांति पहुंचाते हैं. शहरों से लोग पहाड़ों की ओर अक्सर लोग निकल भी पड़ते हैं, शांति की खोज में, क्योंकि वहां का वातावरण है ही ऐसा कि जब लगे कि मन को शांति की जरूरत है तो सबसे पहले पहाड़ का ही खयाल आता है. पहाड़ दिखने में जितने सुंदर लगते हैं, ठीक उसके विपरीत वहां का जीवन बहुत ही कठिन है. जो लोग वहां सैर सपाटे के लिए आते हैं उनको तो होटलों में रहना होता है, जो कि अच्छी जगहों पर स्थित हैं. परन्तु पहाड़ के अधिकतर लोग बाज़ार और सड़क से दूर रहते हैं. जहाँ पर मूलभूत सुबिधाएं पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं.
इन्ही खूबसूरत पहाड़ों के बीच वहां के लोग अपनी कठिन जिंदगी से रोज जद्दोजहद करते हैं. पहाड़ की जिंदगी में सबसे कठिन परिस्थिति नारी की है. वर्तमान समय में हालाँकि पहले के अनुरूप अब पहाड़ों में जीवन थोडा आसान हो गया है. किन्तु पहाड़ की नारी आज भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इन पहाड़ों से जद्दोजहद में लगी रहती है. नारी ही है जो बहुत से लोगों के लिए यहाँ प्रेरणा का स्रोत भी है. क्योंकि पहाड़ में उसे अपनी जरूरतों का अधिकांश सामान प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त करना होता है. उसे जहाँ पशुओं के चारे और लकड़ियों के लिए जंगलों में जाना पड़ता है, तो पानी के लिए भी दूर प्राकृतिक स्रोतों पर जाना पड़ता है. हालांकि कई गावों में अब पानी पहुँच चुका है. खेतों में यहाँ पर अधिकांश काम नारी को ही करना पड़ता है. यहाँ खेती-बाड़ी भी वर्षा पर निर्भर है, जिससे कई बार बारिश न होने के कारण नुकसान हो जाता है और अनाज में कमी हो जाती है. हालांकि बाज़ार में अनाज उपलब्ध होता है परंतु लोगों को बाज़ार से भी अनाज पैदल ढोकर लाना पड़ता है. क्योंकि पहाड़ में रास्ते भी काफी उबड़-खाबड़ हैं. परंतु अब लोगों ने इनसे नाता जोड़ लिया है. चाहे इसे मजबूरी कहा जाए या आदत.! पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या यहाँ पर रोजगार की मात्रा में कमी है, जो कि पहाड़ के लिए एक अभिशाप भी है. इसी कारण यहाँ के अधिकांश पुरुष रोजगार की तलाश में पहाड़ से दूर शहरों की ओर चले जाते हैं. जो कि त्योहारों और अन्य सार्वजनिक कार्यों में ही पहाड़ आ पाते हैं. जिससे घर-परिवार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी घर की नारी पर आ जाती है. जिसे वह सदियों से निभाती आ रही है. नारी की महानता यहाँ काफी देखने को मिलती है, क्योंकि इतनी कठिन जिंदगी के बाबजूद उसके माथे पर सिकन तक नहीं आती है. जरूर अपनों से दूरी कभी-कबार उसे रुला देती है, मगर उसका असर वह अपने जीवन पर नहीं पड़ने देती और यूं ही भाग दौड़ मे लगी रहती है.
पहाड़ में जीवन की हर आवश्यक वस्तुओं के लिए दूर जाना पड़ता है. यहाँ पर विद्यालय भी काफी दूर-२ हैं. जिसके कारण दूर दराज के लोग अपनी लड़कियों को पढने के लिए नहीं भेज पाते हैं. विद्यालय की दूरी से ज्यादा इसका कारण गरीबी है. क्योंकि यहाँ के लोगों को कई बार प्राकृतिक आपदाओं का भी सामना करना पड़ता है, जो कि यहाँ के लोगों का जीवन कई वर्ष पीछे धकेल देता है. जिसके कई उदारहण हमारे सामने हैं. पहाड़ के लोगों को यहाँ की सरकार की ओर से पर्याप्त सुबिधाएं नहीं मिल पा रहीं हैं. जिसके कारण आज पहाड़ के कई परिवार यहाँ से पलायन भी कर चुके हैं. यह भी पहाड़ के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. पहाड़ की जनसँख्या में अधिकांश महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे हैं. यहाँ की नारी इन सभी समस्याओं से लड़ती हुई अपने बच्चों और परिवार के भरण-पोषण में लगी हुई है.
पहाड़ में अभी भी स्वास्थ्य सेवाएं ठीक से उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण यहाँ के लोगों को अपना इलाज करवाने के लिए काफी दूर जाना पड़ता है और गंभीर बीमारी में तो शहरों की ओर दौड़ना पड़ता है. जिस कारण कई बार दुर्घटनाएं भी घटित हो जाती हैं और उसका मूल्य जीवन के रूप में चुकाना पड़ता है. सरकार को इस विषय में ध्यान देना चाहिए और यहाँ के निवासियों के लिए ये सुबिधाएं उपलब्ध करवानी चाहिएं. हालांकि बार-२ चुनाव के वक्त वादे किए जातें हैं किन्तु पूर्ण नहीं किए जाते हैं. आजकल कई लोग अपनी जरूरतों की मांग उठा भी रहें हैं. अब देखने वाली बात होगी कि उनकी उम्मीद और मागें कब तक पूर्ण होंगीं.!
आज वर्तमान युग भौतिकवाद का युग है, जिससे जहाँ सुबिधाएं बढ़ी हैं तो जीवन का मूल्य भी बढ़ गया है. पहले लोग अपनों की खबर के लिए डाक पर निर्भर थे तो आज वहीँ फ़ोन जैसी सुबिधा भी उपलब्ध हो गयीं हैं, जिससे कम से कम सुख दुःख में अपनों से जल्दी संपर्क हो जाता है. यहाँ पर लोग पूरे गाँव को अपना परिवार ही मानते हैं और हर काम-काज में एक दूसरे का हाथ बांटते हैं. यही कारण है जिसके कारण यहाँ के कठिन जीवन में भी लोग अपना जीवन जीते आ रहें हैं. पहाड़ लोग यहाँ के जीवन से जद्दोजहद करते हुए लगभग आज हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रहें हैं. जहाँ अधिकांश पुरुष सेना में अपनी सेवाएं दे रहें हैं, जो की पहाड़ में रोजगार का भी मुख्य जरिया है. उनकी बहादुरी और उनका समर्पण इसे रोजगार के साथ-२ उन्हे देश की सेवा का भी मौका देता है.
पहाड़ की संस्कृति और यहाँ का जीवन इसे अन्य क्षेत्रों से अलग प्रदर्शित करता है. यहाँ की सांस्कृतिक विरासत का एक लंबा इतिहास रहा है. यहाँ के इतिहास से यहाँ की नारी शक्ति और यहाँ के रणबांकुरों की कुर्बानी और वीरगाथाएं का पता चलता है. जो कि यहाँ के नौजवानों और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं. यहाँ के लोग काफी मृदुभाषी हैं, जिसके कारण यहाँ जो लोग घूमने आते हैं तो फिर बार-२ आते हैं. जिससे लोगों को रोजगार भी प्राप्त होता है और मेहमान नवाजी करने को भी मिलता है. जिससे यहाँ की संस्कृति का हस्तांतरण लगातार हो रहा है. प्रकृति ने यहाँ अपनी छटा बिखेरी है तो अब यहाँ पर यदि भौतिकवादी सुबिधाएं भी उपलब्ध हों जाए तो यहाँ का जीवन और भी सरल, सौम्य और खुशहाल हो जायेगा...

जय भारत – जय उत्तराखंड

© अनूप सिंह रावत “गढ़वाल इंडियन”
दिनांक – १३-०२-२०१५ (इंदिरापुरम)