बिन त्यारा रूड़ी कु घाम सी,
तेरो आण से बसंत सी बहार।
बर्खौणी रै माया चौमास सी,
रुझुणु रौं मी, रौ माया कु बुखार।।
- अनूप रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - 23-09-13 (इंदिरापुरम)
तू खुदेणी वख, मी यख,
या कनि प्रीत तेरी मेरी।
सदनी बिटि ही राई सुवा,
या दुन्या प्रीत की वैरी।।
© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - 19-09-2013 (इंदिरापुरम)
तू जून सी जुन्याली।
घुघती सी तेरी सांखी।
ओंटिडी तेरी चुप रैन्दि।
प्रीत बिगांदी तेरी आँखी।
तेरा नाक नथुली।
स्वाणी गौला हंसुली।
स्वाणी माथा बिंदुली।
ह्युं सी तेरी दंतुडी।
आंछिर सी रूप तेरो।
जिया लूछी लीगो मेरो।
चित मन मा तू ही छै।
तू ही सुपिन्यों मा छै।
तेरु ही नौं छू जपणु।
बिन त्वे मन नि लगणु।
सांची प्रीत तेरी मेरी।
सरी दुनिया च देखणु।
सुपिन्या सच करी द्यूं।
त्वे फूलमाला पैने द्यूं।
सबका समिणी आज त्वे।
औ सुवा अपडी बणे द्यूं।।
© अनूप रावत "गढ़वाली इंडियन"
17-09-2013 (इंदिरापुरम)
न लगो तू मिठी-मिठी छ्वीं बता,
तेरी छुयों मा अलिझे नि जों कखि.
बौल्या समझुणु रों जमानु मिथे,
अर मैं त्वैमा माया लगाणु रों कखि..
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – ०४-०९-२०१३ (इंदिरापुरम)
चीखकर न खुदा मिले, न मिलेगा भगवन ।
पाना है गर उसे, तो निर्मल करले मन ।१।
कर संगत ज्ञानी की, राम नाम तू जपना ।
छोड़ के आदत बुरी, सांच को ले अपना ।२।
प्रेम भी देखो खेल हुआ, हर कोई खेलत जाय ।
बात करें है बड़ी-बड़ी, अंत में हाथ छोड़ जाय ।३।
धन ही सबसे पहले है, चाहे भला ये जग छूटे ।
महिमा इसकी अपार है, सब रिश्ते नाते टूटे ।४।
भांति-भांति के लोग यहाँ, जाति धर्म अनेक ।
अनूप कहे सबसे इतना, मानवता ही नेक ।५।
बिन नारी के सून है, ये सारा ही संसार ।
एक ही जन्म में धरे, देख ले रूप अपार ।६।
आँख मूंदकर यूं इंसान को, न तू भगवन मान ।
ढोंगी को मान देकर, प्रभु का न कर अपमान ।७।
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – २७-०८-२०१३ (इंदिरापुरम)
नमस्कार मित्रों...
कुछ दिन पूर्व श्री मदन डुकलान जी और श्री गिरीश सुंदरियाल जी द्वारा सम्पादित गढ़वाली साहित्य की "अंग्वाल" पुस्तक छपी है.
जिसमे उत्तराखंड के बहुत से साहित्यकारों की रचनाओं का समावेश है. इस पुस्तक में मेरी भी एक कविता "कन्या भ्रूण हत्या" छपी है.
संपादक मंडल और संकलनकर्ता श्री भीष्म कुकरेती जी का बहुत-२ धन्यवाद करता हूँ. महेंद्र राणा जी का भी धन्यवाद, जिन्होंने यह मुझ तक पहुंचाई...
पुस्तक की अधिक जानकारी और ऑनलाइन खरीदने के लिए www.angwal.in पर देखें...
आप सभी मित्रों का भी सदैव प्यार बना रहता है, आप सब का भी तहे दिल से धन्यवाद. कोशिश करूंगा की आगे से भी मैं आप लोगों तक अपनी कविताएं पंहुचा सकूं...
आपका अपना
अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ऐंसू का चौमास, कनि बरखा लगी.
डांडा कांठा मेरा, किले बोगण लगी.
देवभूमि मा यु क्या होण लग्युं च,
हे प्रभु यु कनु हाहाकार मची.
यनु क्या जी ह्व़े, कि प्रभु रूठिगे,
या फिर कैकी नजर लगी होली.
हैंसदा खेलदा मेरा गाँव मुलुक मा,
या निर्भे निठुर आपदा आई होली.
दिन रात सरग बरखुंदु रायी,
गौं का गौं कन्ना बोगी गैना.
बाटा घाटों मा ह्व़े उजाड़ बिजाड़,
झणी कतगों की जान गैना.
गाड़ गदेरी लर तर बणी छन,
ओर पोर सरया बोगि लीजाणा.
शान मेरु मुलुक का जु पहाड़,
खिसकण पर लगदी छन जाणा.
धन मेरा देश का जवानों कु,
जोंन कई मनखी बचाई देनी.
खाणु पेणु पहुंचे लोगों तक अर,
साक्षात् प्रभु कु रूप जणू लेनी.
मुंड ढकाणु कु कूड़ी नि रायी,
सरकार का सारा बैठ्या छन.
खाणु पेणु की भारी कमी ह्वेगे,
वू खुट मा खुटु धैरी बैठ्या छन,
कुछ एक लोग औणा मदद कु,
जनु-तनु के गुजारु हुणु चा.
कै ता अब भी लापता हुयां छि,
तौंकी खोज खबर बल होणी चा.
हे प्रभु अब त ठैरी जा दी,
भूल ह्वेगे क्वी त माफ़ करि दे.
आस तू ही छै हमारी अब हे,
अज्वाण तेरा भक्त तारि दे...
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – ०२-०८-२०१३ (इंदिरापुरम)
मन उदास अर ख्याल तेरु.
सरैल मेरु अर हिया तेरु.
उडी-२ त्वैमा ही औंदु सुवा.
नि मणदू यु बालू मन मेरु.
© अनूप रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - २५-०७-२०१३ (इंदिरापुरम)
तेरे इश्क में इतना खो गया हूँ,
कि अब जहां की खबर तक नहीं.
तू कर यकीं या न कर ए सनम,
रब से तेरे सिवा कुछ मांगू नहीं...
© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
इंदिरापुरम, गाजियाबाद (१०-०७-२०१३)
बिधाता कु त्वे स्वाणु रूप दियुं,
हर क्वी त्वे पौणा कु वर मांगलु।।
तू हे रात मा भैर नि ऐयी सुवा,
त्वे देखि की चाँद भी शरमै जालु।।
© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - ३० -०५-२०१३ (इंदिरापुरम)
धन तेरु रूप धन माया तेरी।
मैं दिखेणी च बस अन्वार तेरी।
यु कन्नु रोग लगि ज्वानी मा,
कि सेणी खाणी हर्चिगे मेरी।।
©अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - २४-०५-२०१३ (इंदिरापुरम)
क्यांकु सुपिन्यों मा ऐकि सताणी छै.
समणी ऐकि तू हैंसी की भरमाणी छै.
औंदा जांदा किलै तू मैं भट्याणी छै.
सुधि मुधि बानु बणे की बच्याणी छै.
तेरा दिल मा प्रीत की जोत जगी च,
दिल की बात तू किलै नि बिंगाणी छै.
©अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - ०२-०५-२०१३ (इंदिरापुरम)