फागुण देखा ऐग्याई,
त्योहार रंगों कु ऐग्याई.
स्वर्ग से लेकि धरा तक,
स्वाणी बहार ऐग्याई..
रंगी जौंला सभी रंग मा,
प्यार खतेणु लगी ग्याई.
मुखुड़ी गात रंग्याणा कु,
अबीर गुलाल ऐग्याई..
फूलों मा फुलार ऐग्याई,
डांडी कांठ्यूं मौल्यार ऐग्याई.
चौ तरफों बहार देखि की,
मनिख्यों मा उलार ऐग्याई..
बनी-२ पकवान बणला,
चुला कढ़े चढ़ी ग्याई.
मिली बांटी की खौंला,
रीत सदनी बिटि य राई..
आवा दगिड्यों चौक मा,
होरी का गीत गावा.
रंगमत ह्वे जावा सभि,
होली रंग मा रंगी जावा.
अवध मा खेलला होरी,
साक्षात सीता राम.
गोप्युं का दगिडी फूलों की,
बृन्दावन मा राधा श्याम..
फागुण देखा ऐग्याई,
त्योहार रंगों कु ऐग्याई..
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – ०४-०३-२०१५ (इंदिरापुरम)
शीर्षक : पहाड़ और जीवन
लेख : अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
“पहाड़” शब्द का नाम सुनते ही मन मे तरह-२ की कल्पनाएं घर करने लगती हैं. पहाड़ के नाम से ही मन रोमांचित हो जाता है. मन में पहाड़ों की सुंदरता के ख्याल आने लगते हैं, वहां के हरे-भरे पेड़-पौधों और रंग-बिरंगे फूलों के चित्र मन में उमड़ने लगते हैं. जो कि मन को शांति पहुंचाते हैं. शहरों से लोग पहाड़ों की ओर अक्सर लोग निकल भी पड़ते हैं, शांति की खोज में, क्योंकि वहां का वातावरण है ही ऐसा कि जब लगे कि मन को शांति की जरूरत है तो सबसे पहले पहाड़ का ही खयाल आता है. पहाड़ दिखने में जितने सुंदर लगते हैं, ठीक उसके विपरीत वहां का जीवन बहुत ही कठिन है. जो लोग वहां सैर सपाटे के लिए आते हैं उनको तो होटलों में रहना होता है, जो कि अच्छी जगहों पर स्थित हैं. परन्तु पहाड़ के अधिकतर लोग बाज़ार और सड़क से दूर रहते हैं. जहाँ पर मूलभूत सुबिधाएं पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं.
इन्ही खूबसूरत पहाड़ों के बीच वहां के लोग अपनी कठिन जिंदगी से रोज जद्दोजहद करते हैं. पहाड़ की जिंदगी में सबसे कठिन परिस्थिति नारी की है. वर्तमान समय में हालाँकि पहले के अनुरूप अब पहाड़ों में जीवन थोडा आसान हो गया है. किन्तु पहाड़ की नारी आज भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इन पहाड़ों से जद्दोजहद में लगी रहती है. नारी ही है जो बहुत से लोगों के लिए यहाँ प्रेरणा का स्रोत भी है. क्योंकि पहाड़ में उसे अपनी जरूरतों का अधिकांश सामान प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त करना होता है. उसे जहाँ पशुओं के चारे और लकड़ियों के लिए जंगलों में जाना पड़ता है, तो पानी के लिए भी दूर प्राकृतिक स्रोतों पर जाना पड़ता है. हालांकि कई गावों में अब पानी पहुँच चुका है. खेतों में यहाँ पर अधिकांश काम नारी को ही करना पड़ता है. यहाँ खेती-बाड़ी भी वर्षा पर निर्भर है, जिससे कई बार बारिश न होने के कारण नुकसान हो जाता है और अनाज में कमी हो जाती है. हालांकि बाज़ार में अनाज उपलब्ध होता है परंतु लोगों को बाज़ार से भी अनाज पैदल ढोकर लाना पड़ता है. क्योंकि पहाड़ में रास्ते भी काफी उबड़-खाबड़ हैं. परंतु अब लोगों ने इनसे नाता जोड़ लिया है. चाहे इसे मजबूरी कहा जाए या आदत.!
पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या यहाँ पर रोजगार की मात्रा में कमी है, जो कि पहाड़ के लिए एक अभिशाप भी है. इसी कारण यहाँ के अधिकांश पुरुष रोजगार की तलाश में पहाड़ से दूर शहरों की ओर चले जाते हैं. जो कि त्योहारों और अन्य सार्वजनिक कार्यों में ही पहाड़ आ पाते हैं. जिससे घर-परिवार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी घर की नारी पर आ जाती है. जिसे वह सदियों से निभाती आ रही है. नारी की महानता यहाँ काफी देखने को मिलती है, क्योंकि इतनी कठिन जिंदगी के बाबजूद उसके माथे पर सिकन तक नहीं आती है. जरूर अपनों से दूरी कभी-कबार उसे रुला देती है, मगर उसका असर वह अपने जीवन पर नहीं पड़ने देती और यूं ही भाग दौड़ मे लगी रहती है.
पहाड़ में जीवन की हर आवश्यक वस्तुओं के लिए दूर जाना पड़ता है. यहाँ पर विद्यालय भी काफी दूर-२ हैं. जिसके कारण दूर दराज के लोग अपनी लड़कियों को पढने के लिए नहीं भेज पाते हैं. विद्यालय की दूरी से ज्यादा इसका कारण गरीबी है. क्योंकि यहाँ के लोगों को कई बार प्राकृतिक आपदाओं का भी सामना करना पड़ता है, जो कि यहाँ के लोगों का जीवन कई वर्ष पीछे धकेल देता है. जिसके कई उदारहण हमारे सामने हैं. पहाड़ के लोगों को यहाँ की सरकार की ओर से पर्याप्त सुबिधाएं नहीं मिल पा रहीं हैं. जिसके कारण आज पहाड़ के कई परिवार यहाँ से पलायन भी कर चुके हैं. यह भी पहाड़ के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. पहाड़ की जनसँख्या में अधिकांश महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे हैं. यहाँ की नारी इन सभी समस्याओं से लड़ती हुई अपने बच्चों और परिवार के भरण-पोषण में लगी हुई है.
पहाड़ में अभी भी स्वास्थ्य सेवाएं ठीक से उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण यहाँ के लोगों को अपना इलाज करवाने के लिए काफी दूर जाना पड़ता है और गंभीर बीमारी में तो शहरों की ओर दौड़ना पड़ता है. जिस कारण कई बार दुर्घटनाएं भी घटित हो जाती हैं और उसका मूल्य जीवन के रूप में चुकाना पड़ता है. सरकार को इस विषय में ध्यान देना चाहिए और यहाँ के निवासियों के लिए ये सुबिधाएं उपलब्ध करवानी चाहिएं. हालांकि बार-२ चुनाव के वक्त वादे किए जातें हैं किन्तु पूर्ण नहीं किए जाते हैं. आजकल कई लोग अपनी जरूरतों की मांग उठा भी रहें हैं. अब देखने वाली बात होगी कि उनकी उम्मीद और मागें कब तक पूर्ण होंगीं.!
आज वर्तमान युग भौतिकवाद का युग है, जिससे जहाँ सुबिधाएं बढ़ी हैं तो जीवन का मूल्य भी बढ़ गया है. पहले लोग अपनों की खबर के लिए डाक पर निर्भर थे तो आज वहीँ फ़ोन जैसी सुबिधा भी उपलब्ध हो गयीं हैं, जिससे कम से कम सुख दुःख में अपनों से जल्दी संपर्क हो जाता है. यहाँ पर लोग पूरे गाँव को अपना परिवार ही मानते हैं और हर काम-काज में एक दूसरे का हाथ बांटते हैं. यही कारण है जिसके कारण यहाँ के कठिन जीवन में भी लोग अपना जीवन जीते आ रहें हैं. पहाड़ लोग यहाँ के जीवन से जद्दोजहद करते हुए लगभग आज हर क्षेत्र में अपना योगदान दे रहें हैं. जहाँ अधिकांश पुरुष सेना में अपनी सेवाएं दे रहें हैं, जो की पहाड़ में रोजगार का भी मुख्य जरिया है. उनकी बहादुरी और उनका समर्पण इसे रोजगार के साथ-२ उन्हे देश की सेवा का भी मौका देता है.
पहाड़ की संस्कृति और यहाँ का जीवन इसे अन्य क्षेत्रों से अलग प्रदर्शित करता है. यहाँ की सांस्कृतिक विरासत का एक लंबा इतिहास रहा है. यहाँ के इतिहास से यहाँ की नारी शक्ति और यहाँ के रणबांकुरों की कुर्बानी और वीरगाथाएं का पता चलता है. जो कि यहाँ के नौजवानों और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं. यहाँ के लोग काफी मृदुभाषी हैं, जिसके कारण यहाँ जो लोग घूमने आते हैं तो फिर बार-२ आते हैं. जिससे लोगों को रोजगार भी प्राप्त होता है और मेहमान नवाजी करने को भी मिलता है. जिससे यहाँ की संस्कृति का हस्तांतरण लगातार हो रहा है. प्रकृति ने यहाँ अपनी छटा बिखेरी है तो अब यहाँ पर यदि भौतिकवादी सुबिधाएं भी उपलब्ध हों जाए तो यहाँ का जीवन और भी सरल, सौम्य और खुशहाल हो जायेगा...
जय भारत – जय उत्तराखंड
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाल इंडियन”
दिनांक – १३-०२-२०१५ (इंदिरापुरम)
जीवन की गाड़ी धकेले रे मनखी, बाटू च अभी बडू दूर.
भाग मा त्यारा जू कुछ भी होलू, एक दिन त्वे मिललू जरूर.
करम करदी जा, धरम करदी जा ...................
अधर्म कु बाटू भेल ली जांदू, धर्म कु बाटू स्वर्ग मा जांदू.
जैका जनि कर्म हे मनखी, फल भी दगिद्या ऊनि पांदू.
जाति-पांति सब भेदभाव छोड़, सब च वै विधाता की नूर.
जीवन की गाड़ी ....... भाग मा त्यारा ..........
फूलों कु बाटू बण्यूं च त्वेकू, कांडों का बाटा किलै छै जाणु.
सब कुछ पाके भी से बाटा मनखी, त्वेन कभी सुख नि पाणु.
दया धर्म कु बाटू जा रे मनखी, ना बण तू हे इतगा क्रूर.
जीवन की गाड़ी ....... भाग मा त्यारा ..........
बगत कभी रुक्युं नि रांदु, आदत येकी भी मनखी जनि च.
सब कुछ च त्वैमा हे मनखी, बस एक धीरज की कमि च.
मनखी चोला माटा कु च रे, चखुलू सी उड़ी जालू फूर.
जीवन की गाड़ी ....... भाग मा त्यारा ..........
रंग ही नि हुंदू फूलों की पछ्यांण, कांडों ना भी पछ्यांण हुंद.
रंग रूपल नि पछ्नेंदु मनखी, वैका कर्मों न पछ्याण हुंद.
प्रेम कु कल्यों त्वैमा रे मनखी, बांटी सकदी बांटी ले भरपूर.
जीवन की गाड़ी ....... भाग मा त्यारा ..........
पालू सदानी नि रैंदु चमकुणु, घाम आण मा सर्र गैली जान्द.
पाप की गठरी नि बाँध रे, पाप कु घाडू फट्ट फूटी जान्द.
अहम् छोड़ी दे रे दगिद्या, न कैर मनखी तू भंड्या गुरूर.
जीवन की गाड़ी ....... भाग मा त्यारा ..........
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – २८-०१-२०१५ (इंदिरापुरम)
*** गढ़वाली शायरी ***
फूलों थैं क्या देखण, त्वे देखियाली.
भोली अन्वार तेरी, दिल मा बसैयाली.
प्रीत लागी गे, हे सुवा त्वैमा मेरी.
सबका सामणी आज, मिन बोलियाली..
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – १७-०१-२०१५ (इंदिरापुरम)
गीत : बाजूबंद गीत गाणी हो
दाथुड़ी लेकि घासा कु जांदी,
ग्वरेल छोरों की बांसुरी सूणी,
स्वामी की खुद मा खुदेणी हो.
वा बैठी डाल्युं का छैल,
घास घसेन्यों का गैल,
बाजूबंद गीत गाणी हो ...
कै दिन मैना बीती साल,
स्वामी बौडी घार नि आया,
पापी नौकरी का बाना,
द्वी जनों कु बिछड़ो हुयुं च,
स्वामी राजी ख़ुशी रयां,
देवतों थैं वा मनाणी हो ...
वा यखुली पहाड़ मा,
ऊनि काम काज सार्युं कु,
ऊनि दुध्याल नौन्याल,
स्वामी का खातिर वींकी,
घ्यु की ठेकी भोरियाल,
तू हिकमत ना हारी हो ...
आंखी थकी बाटू देखि-२,
दिन याद मा धक्याणी,
बुढ्या सासु ससुर की सेवा,
अपडू ब्वारी धर्म निभाणी,
धन त्वेकू पहाड़ा की नारी,
रै सदानी सुहागिणी हो ...
बाजूबंद गीत गाणी हो ...
बाजूबंद गीत गाणी हो ...
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – ०३-०१-२०१५ (इंदिरापुरम)
कख छै सुवा, कख तू लुकी रे,
मन की पीड़ा त्वेन जाणी ना.
तेरो नाम ए दिल मा लेखी सकी ना ...
आकाश मा खोजे, धरती मा भेंटि सकी ना,
तेरी याद मा आंख्युं बिटी आंसू बरखदा,
निठुर दुन्या न रोकी सकी ना .....
ऐजा सुवा, त्वे बिगैर ज्यू सकदु ना ...
गीत जारी है ........
अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – ३०-१२-२०१४ (इंदिरापुरम)
तेरी आंख्युं का सौं, प्यार त्वेसे करुदु छौं.
यूं सांसों का सौं, त्वे पर मी मरुदु छौं.
सच माण या न माण, तू हे मेरी दगिद्या,
साँची माया मी, त्वेसणी करुदु छौं ...
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – २३-११-२०१४ (इंदिरापुरम)
*** गढ़वाली शायरी – अनूप रावत ***
संसार भूली ग्युं मी त्वे देखि की.
तुमसणी अपड़ा दिल मा समझिकी.
मी पूजा करदू माया की .....
तुम्हारी इच्छा हे सुवा, साथ दे, न दे,
मी शरण ऐग्युं तुम्हारी माया की ...
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – १७-१०-२०१४ (इंदिरापुरम)

*** गढ़वाली शायरी ***
जब बिटिन देखि त्वेथै सुवा,
सुपिन्या त्यारा ही देखणु छौं।
तेरी माया कु रोगी बणिग्युं,
नौ दिन राति तेरु ही जपणु छौं।।
© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक - ०९-१०-२०१४ (इंदिरापुरम)
सुपिन्यों मा आंदी, निंद चुरै कि ली जांदी.
तेरी मयाली मुखुड़ी देखी, जिकुड़ी धकद्यांदी.
तू छै बांदों मा की बांद, चांदों मा की चाँद,
बांद गढ़वाल की ..... बांद पहाड़ा की .....
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – १९-०९-२०१४, (इंदिरापुरम)
फ्योली सी मुखुड़ी तेरी दमकणी,
नाका की नथुली भली सजणी..
धवल ह्युं जनि दांतुड़ी चमकणी,
डांड्यू आंछिरी सी स्वाणी लगणी..
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – १३-०९-२०१४ (इन्दिरापुरम)
छोड़ी की ईं दुन्यादारी थैं आज हम,
औ लठ्याली, माया कु घोळ बणोंला,
ईं माया बैरी दुन्या से चल दूर कखि,
स्वर्ग जनु सुंदर एक घर बणोंला।।
© अनूप सिंह रावत, दिनांक – 02-09-14
ग्वीन मल्ला, गढ़वाल (इंदिरापुरम)