Thursday, June 2, 2016

गढ़वाली शायरी - अनूप सिंह रावत

हैंसणु-खेळणु, रूठणु-मनाणु,
यनि माया की रस्यांण च।
सुख-दुःख मा सदनी साथ,
साँची माया की पछ्याण च।।

© 30-05-16 अनूप सिंह रावत
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी (उत्तराखंड)

Thursday, May 19, 2016

चकबंदी कु गीत लगै दे

:: चकबंदी कु गीत लगै दे ::

हे गीतांग दिदा, जरा चकबंदी कु गीत लगै दे।
गरीब क्रांति अभियान की, अलख गौं-2 जगै दे।।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।1।।

कभि या बांद कभि वा बांद, कै त्वैन गिणे याली।
प्रेम गीत बनी-बनी का, त्वैन यूँ पर मिसै याली।।
एक गीत जरा अब तू, चकबंदी पर भी मिसै दे।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।2।।

राजनीति कु जोड़ भाग, सब त्वैन हम समझें याल।
कैसेट बिके खूब बाजारों मा, ईनाम भी कमै याल।।
यनु ही गजब कु गीत, अब चकबंदी कु भी लगै दे।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।3।।

द्यो-देवतों का जागर लगै, भूत-मसाण भी नचैली।
देश-विदेश जागरणों मा, त्वैन धूम खूब मचैली।।
एक घाण चकबंदी का नौ की, तू हुड़का घुरै दे।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।4।।

नै-नै गितेर रे, तेरा खूब आणा डी.जे.वाला गीत।
कभी रॉक&रॉल, कभी पॉप, जौमा गजब संगीत।।
जनि तेरी मर्जी उनि एक गीत, चकबंदी कु लगै दे।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।5।।

पलायन गर यनु ही हूणु रालु, ऐ उत्तराखंड बिटि।
कैकु गैली तू स्यु गीत, नि बजिणी तब तेरी सीटी।
चकबंदी की अलख जगै की, यों यखी रोकि दे।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।6।।

गीतांग दिदा अनूप की बातों कु, बुरु न माणी रे।
पहाड़ कु प्रेमी च यु नादां त, यनि ऐकि गाणी रे।।
चकबंदी आंदोलन मा, अपड़ा गीतों से जान डाली दे।
हे गीतांग दिदा रे ... हे गितेर दिदा रे ... ।।7।।

© 11-02-2016 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
www.iamrawatji.blogspot.in

Thursday, March 31, 2016

लेख: पलायन अभिशाप, चकबंदी वरदान


लेख: पलायन अभिशाप, चकबंदी वरदान

उत्तराखंड जो कि भारत देश का एक पर्वतीय राज्य है, भौगोलिक दृष्टिकोण से एक विषम परिस्तिथियों वाला प्रदेश है. यहाँ का पहाड़ी क्षेत्र जितना खूबसूरत है, उसके विपरीत यहाँ का जीवन उतना ही कठिन है. यहाँ का प्रमुख व्यवसाय कृषि रहा है. जिसमे कि अब लगातार गिरावट आ रही है. पहाड़ में रोजगार पाने का मुख्य जरिया सेना है. यहाँ के ज्यादातर युवा फ़ौज में जाते हैं और रोजगार के साथ-२ देश सेवा में अपना अमूल्य योगदान देते हैं. यहाँ पर विद्यालयी शिक्षा के उपरांत उच्चतम शिक्षा के लिए छात्रों को बहुत दूर-२ जाना पड़ता है. क्योंकि उच्चतम शिक्षा के यहाँ सीमित ही संस्थान हैं. जिसमे से ज्यादातर शहरों में हैं. जिसके कारण बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए यहाँ से बाहर ले जाते हैं. जो युवा यहीं शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनको भी यहाँ रोजगार की समस्या से जूझना पड़ता है, और वो भी रोजगार की तलाश में यहाँ से पलायन कर अन्य राज्यों की और रूख करते हैं. यही कारण है कि उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्सों से आज लगातार पलायन हो रहा है और इसी तरह पलायन होता रहा तो निश्चित ही यह क्षेत्र एक दिन सूना हो जायेगा. इसकी एक झलक बहुत से गांवों में देखी जा सकती है. पलायन का एक कारण यह भी है कि वर्तमान समय में लोग भौतिक सुबिधाओं के लिए भी पहाड़ से दूर जा रहे हैं, जिनका का यहाँ पर अभाव है. पलायन उत्तराखंड के लिए एक अभिशाप की तरह लगातार फन फैला रहा है. अगर अभी इस विषय पर सोच विचार न किया गया तो आने वाले समय में उत्तराखंड में पहाड़ तो रहेंगे किंतु पहाड़ी नहीं. क्योंकि बहुत से लोग जो कि रोजगार के लिए इन क्षेत्रों में आये थे वो यहाँ बस भी गए हैं, जिनमें नेपाली, बिहारी और उड़िया लोग ज्यादातर शामिल हैं. पलायन के कारण यहाँ से लोग लगातार कम हो रहे हैं और यहाँ की सरकार कुछ भी नहीं कर रही है. अब समाजसेवी ही इस और ध्यान दे रहें हैं और लोगों को और सरकार को जागरूक कर रहें हैं. पलायन के कारण यहाँ की संस्कृति, रीति-रिवाज और नैतिक मूल्यों का भी ह्रास हो रहा है. जिस उत्तराखंड की मांग एक अलग सशक्त और समृद्ध राज्य के लिए की गई थी आज वह पलायन की मार झेल रहा है और यहाँ के नेता जो कि स्वयं को लोगों का मसीहा कहते हैं, राजनीति के नशे में डूबे हुए हैं. अभी भी वक़्त है कि यहाँ के प्रमुख व्यवसाय कृषि पर ध्यान दिया जाय और पलायन को रोका जाय.
पलायन को रोकने के लिए चकबंदी एक वरदान साबित हो सकती है. इसका उदाहरण हिमाचल प्रदेश हमारे सामने है. जो कि उत्तराखंड की भांति समान परिस्तिथियों वाला प्रदेश है. चकबंदी के कारण वहां पर खेती में लोग अपना रोजगार स्वयं पैदा करते हैं और खेती से ही अपने घर-परिवार आसानी से चला रहे हैं. “गरीब क्रांति अभियान” एक ऐसा ही अभियान है, जिसका प्रयास है कि उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्से में चकबंदी कर यहाँ के लोगों को पुनः खेती की ओर अग्रसर किया जाए और उनको यहीं पर रोजगार प्राप्त हो सके. गणेश सिंह “गरीब” जी के नेतृत्व में युवा कपिल डोभाल जी और साथियों ने उत्तराखंड में भी चकबंदी करवाने की ठानी है और उनके साथ इस कार्य में बहुत से लोग जुड़े हुए हैं. सभी लोग लगातार जन-जागरण के काम में लगे हैं और जगह-२ अभियान को बढ़ा रहे हैं. ताकि लोग जागरूक हों और चकबंदी के लिए सरकार पर भी दबाब बन सके. पिछले कुछ समय से गरीब जी का प्रयास रंग ला रहा है और सरकार भी इस विषय पर गंभीर नजर आ रही है. सरकार ने इसके लिए “भूमि सुधार” नाम से कमेटी का गठन किया है और चकबंदी का ड्राफ्ट भी बना लिया है, जिसमे गणेश सिंह “गरीब” जी भी उपाध्यक्ष हैं. और “गरीब क्रांति अभियान” की टीम सरकार पर लगातार दबाब बनाये हुई है. चकबंदी से पहाड़ में एक बार फिर खेत लह-लहा उठेंगे और यहाँ पर से पलायन पर रोक लगेगी. क्योंकि फिर यहाँ के लोगों को यहीं पर रोजगार प्राप्त हो सकेगा और वो यहीं पर सुखी जीवन यापन कर पाएंगे. जहाँ पलायन यहाँ के लिए अभिशाप बना है तो वहीं दूसरी और चकबंदी वरदान साबित होगी...

नोट: चकबंदी से जुडी अधिक जानकारी के लिए गरीब क्रांति अभियान की वेबसाइट www.garibkranti.in पर देखें.

- अनूप सिंह रावत (चकबंदी समर्थक)
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
E-mail: rawat28anu@gmail.com

गैरसैंण - यात्रा वृत्तान्त

गैरसैंण - यात्रा वृत्तान्त
लेख – अनूप सिंह रावत

इस संस्मरण में गैरसैंण यात्रा का सार लिख रहा हूँ। चकबंदी दिवस, जो कि 1 मार्च 2016 को होना था, उसके लिए दिल्ली से हम लोग गए थे। उसी का विवरण लिखने का एक छोटा सा प्रयास है।

गैरसैंण जाने का कार्यक्रम पहले ही तय हो गया था। जो कि सोशल मीडिया पर बात करते हुए तय किया गया था। मैं बाकी मित्रों का अपने घर के पास राष्ट्रीय राजमार्ग 24 (काला पत्थर) पर इन्तजार कर रहा था। रात करीब 10:30 बजे राकेश रावत भाई जी भी मुझे मिले और हम दोनों बाकी मित्रों का इन्तजार करने लगे। गाड़ी काफी देर में आई और रात्रि 12 बजे पहुंची। गाड़ी में बाकी सभी लोग द्वारका से साथ में आए। जिनमें विकास ध्यानी, अनूप पटवाल, दिनेश चतुर्वेदी, अनोप नेगी और शंकर ढौंडियाल जी थे। विकास ध्यानी जी से ही मैं इससे पहले मिला था, अन्य लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से ही जानता था। हम लोग गाड़ी में सवार होकर आगे बढ़ चले और साथ में एक दूसरे से जान पहचान व बातें होने लगी। गाड़ी हरियाणा के रोहतक जिले के रहने वाले पंडित जी चला रहे थे। मुरादाबाद से पहले हम लोगों ने गाड़ी रोकी और चाय पी। जैसे जैसे हम लोग आगे बढ़ते रहे रास्ते में कुछ जगह कोहरा भी लगा था। ठाकुरद्वारा के पास पहुँच कर ड्राईवर ने गाड़ी रोक ली और जोड़ी देर आराम करने को कहा। वहां पर थोड़ी देर रुकने के बाद हम लोग पुनः आगे चलने लगे। रामनगर में हमारे साथी, जो कि दूसरी गाड़ी से जा रहे थे हमारा इन्तजार कर रहे थे। जिनमें महाराष्ट्र से आये रविन्द्र कुंवर जी और नितिन पंवार जी थे। जो कि दिल्ली से जगमोहन जिज्ञासु जी के साथ थे। करीब सुबह 5:30 पर हम लोग रामनगर पहुंचे। वहां पर उनसे मुलाकात और जान पहचान हुयी। रविन्द्र जी पहली बार उत्तराखंड आए थे। जो की फ़ेसबुक के माध्यम से चकबंदी अभियान से जुड़े थे और काफी गढ़वाली भी सीख गए थे। उनसे मिलकर लग रहा था जैसे कि वह भी उत्तराखंड के ही मूलनिवासी हैं।
रामनगर में फ्रेश हुए और फिर चाय की चुस्कियों के साथ बातचीत का दौर आगे बढ़ रहा था। जिज्ञासु जी ने हमे गरीब क्रांति अभियान, 1 मार्च चकबंदी दिवस का बैनर दिया। जिसे हम लोगों ने अपनी गाड़ी पर लगा दिया। फिर हम लोग आगे के लिए रवाना हो गए। थोड़े आगे जाने पर बैनर उड़ने लगा, जिसे फिर से निकाल दिया और आगे फिर कहीं पर गाड़ी रोककर बांधने का तय हुआ। हम लोग मोहान के रास्ते भिक्यासैंण वाली सड़क के रास्ते गए। मोहान से कुछ आगे रुककर हम लोगों ने चाय पी और नाश्ता किया। अनूप पटवाल और शंकरशंकर ढौंडियाल भाई जी घर से बनी रोटी लाए थे। साथ में गाजर का हलवा भी था। वहां पर नाश्ता करने के बाद हम लोग आगे बढ़ चले। भिक्यासैंण पहुँच कर हम लोग दुकान से टेप खरीदकर लाए और बैनर को अपनी गाड़ी के आगे वाले हिस्से ( बोनट) पर चिपका दिया। ताकि वह अब फिर से निकले नहीं। बाजार में लोगों के साथ चकबंदी को लेकर बातचीत भी हुयी। काफी लोगों ने इस प्रयास को सराहा और कहा कि उत्तराखंड में अब चकबंदी ही एकमात्र उपाय है, जिससे यहाँ से पलायन भी रुकेगा और खेती-बाड़ी भी अच्छी होगी। वहीँ आगे के गांव और बाजारों में भी हम लोग चकबंदी जागरूकता अभियान चलाते हुए जा रहे थे। कुछ लोग काफी निराश लग रहे थे। उनकी समस्या यह थी कि खेती को जंगली जानवर नुकसान पहुंचा रहे हैं और जो कुछ वो उनसे बचा भी पाते हैं तो उनको उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। हम सब लोगों को साथ में ढांढस भी बंधा रहे थे और उनको चकबंदी दिवस में शामिल होने का न्योता भी दे रहे थे। ताकि वो लोग वहां आकर अपनी समस्याओं को बता सके और सरकार तक उनकी बात को हम पहुंचा सके।
आगे चलते-2 हम लोग महलचोरी पहुंचे, जो की गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ता है। पुलिस भी वहां पर चेकिंग के लिए तैनात थी। हम लोगों को भी रोका गया और फिर पूछताछ के बाद आगे बढ़ गए। वहां से फिर हम लोग गैरसैंण पहुँच गए। पहुँचते-2 करीब 1 बज गया था। हम लोग श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम पहुंचे। कुलदीप भाई जी के साथ हम लोग ऑफिस से आश्रम में गए. जहाँ पर हम लोगों के साथी पहले ही पहुँच चुके थे। कपिल डोभाल जी और अन्य लोगों से मुलाकात हुई और जान-पहचान भी। क्योंकि इससे पूर्व हम लोग सिर्फ फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर ही बातचीत हुई थी। फिर सब लोग तरोताज़ा हुए और फिर खाना खाकर शाम की रैली की तैयारी होने लगी। मौसम भी काफी खुशनुमा हो गया था। आसमान में बादल छा गए थे और हल्की-2 बूंदाबादी हो रही थी। थोड़ी देर में चकबंदी के प्रणेता गणेश सिंह "गरीब" जी और उनकी धर्मपत्नी भी पहुँच गए। शाम को करीब 4 बजे सब लोग ढोल-दमो-मसूबाज के साथ वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जी के स्मारक के पास एकत्रित हुए और फिर रैली आरंभ हो गयी। साथ ही हम लोग बाज़ार में चकबंदी की जानकारी से सम्बंधित पोस्टर भी चस्पा कर रहे थे और चकबंदी के फायदे और जानकारी के पर्चे भी बाँट रहे थे। पूरे गैरसैंण बाजार में चकबंदी की गूँज उठ रही थी। रैली आगे बढ़ते हुए ग्राउंड में पहुंची और फिर जोरदार बारिश शुरू हो गयी। सभी लोग मंच की छत के नीचे पहुंचे और जब तक बारिश बंद हुई तब तक ढोल-दमो में नाच-गाना चलता रहा। फिर रैली बाजार से होते हुए वापिस आश्रम में आकर समाप्त हुई। अब रात्रि हो चली थी और सब लोग हॉल में एकत्रित हुए और सब अपना-2 परिचय देने लगे। इस तरह अलग-2 जगहों से आए हुए लोगों से पहचान हुई और सब अपने-2 बारे में और काम के विषय में जानकारी देने लगे। साथ ली चकबंदी पर सभी ने अपने विचार रखे। फिर थोड़ी देर में खाने के लिए बुलावा आ गया, सभी लोग भोजनशाला पहुँच गए और खाना खाने लगे और आश्रम के नियम के हिसाब से खाना खा कर सभी लोगों ने अपने-२ बर्तन वापस धो कर रख दिए. खाना खा कर पुनः सभी लोग हॉल में पहुँच गए और बातचीत का दौर आगे बढ़ा, और सुबह की भी तैयारी पूरी हो गयी थी. फिर सभी लोग सो गए.
सुबह सभी समय पर उठ कर तैयारी करने लगे. हम लोग भी तैयारी करने लगे और सुबह-२ मैं (अनूप रावत), विकास ध्यानी, अनोप नेगी, शंकर ढौंडियाल और राकेश रावत भाई टहलने निकल गए. आश्रम से २ किमी दूर एक छोटी सी नदी थी, उस और निकल पड़े. धीरे-२ सुबह की ठंडी हवा का मज़ा लेते हुए हम सड़क के रास्ते वहां पहुँच गए. पानी काफी ठंडा था, हम लोग उधर से ही हाथ-मुंह धोकर आये. साथ में कुछ यादगार पल भी कैमरे में कैद किये. फिर हम लोग वापस आश्रम पहुंचे. सब लोग तैयार थे और सभी पहले नास्ते के लिए भोजनशाला पहुंचे और फिर सब अलग-२ गाड़ियों से आयोजन स्थल पर पहुंचे. फिर वहां पहुँच कर तैयारी शुरु हो गयी. हम लोग मंच के पास और मैदान के चारों और चकबंदी और गरीब क्रांति अभियान के पोस्टर और बैनर लगाने लगे. फिर धीरे-२ लोग भी पहुँचने लगे. आयोजन स्थल पर कृषि विभाग की प्रदर्शनी लगी हुयी थी. सुन्द्रियाल प्रोडक्शन और गैरसैण फ्रेश ने भी अपने-२ स्टाल लगा रखे थे. जिनमे उत्तराखंडी खाद्य सामग्री उपलब्ध थी. जो कि एक आकर्षण के केंद्र थे. हम सभी लोग चकबंदी और कृषि मंत्री हरक सिंह रावत का इंतजार करने लगे, जो की चक्बदी दिवस के मुख्य अतिथि थे. किंतु जब हमे पता चला की वो नहीं आ रहे हैं तो बहुत ही बुरा लगा. उन्होंने चकबंदी विधेयक के अध्यक्ष श्री केदार सिंह रावत जी को भेज दिया था. उनके साथ कोंग्रेस के प्रवक्ता भी आये थे. अतिथियों में गैरसैण ब्लॉक प्रमुख श्रीमती बिष्ट जी भी पहुंची. साथ में महाविद्यालय के अध्यक्ष भी थे. मंच पर महाराष्ट्र से आये श्री रविन्द्र कुंवर जी और नितिन पंवार जी, गरीब क्रांति की प्रणेता श्री गणेश सिंह “गरीब” जी विराजमान थे. फिर कार्यक्रम शुरू हो गया. सबसे पहले गरीब क्रांति अभियान की सदस्य नूतन पंत जी ने सबको बैच लगाकर स्वागत किया. मंच का संचालन श्री एल.मोहन कोठियाल जी कर रहे थे. कार्यक्रम का शुभारंभ गायिका सुनीता रावत ने चकबंदी गीत गाकर किया. फिर काफल ग्रुप के सदस्यों ने “पांडव नृत्य” प्रस्तुत किया. जिसमे कि छोटे-२ बच्चों ने अपनी कलाकारी से चार चाँद लगा दिए. फिर पास के ही गाँव की महिलायों ने सुंदर ‘चांचरी नृत्य’ प्रस्तुत किया. जिसमे की उत्तराखंड की संस्कृति साफ-२ झलक रही थी. इन प्रस्तुतियों ने सभी लोगों का मन मोह लिया.
फिर मंच पर आसीन लोग अपने-२ भाषण देने लगे. गणेश सिंह “गरीब” जी के भाषण ने लोगों में एक नयी उर्जा ला दी थी. जिसे मनीष सुद्रियाल, मंगल सिंह नेगी, तिवारी जी, विकास ध्यानी, अनूप पटवाल, कपिल डोभाल, अमित गुसाईं, कुलदीप नेगी और साथिओं ने आगे बढाया. महाराष्ट्र से आये रविन्द्र कुंवर जी ने अपना भाषण गढ़वाली से शुरू किया, जो कि सभी लोगों को हैरान करने वाला था. उन्होंने कहाँ कि उन्हें उत्तराखंड की पावन धरती से बहुत लगाव है और यहाँ खेती की अपार संभावनाएं है, जिसे चकबंदी एक नया स्वरुप दे सकती है. अंत में चकबंदी विधेयक के अध्यक्ष केदार सिंह रावत जी अपनी बात रखी और कहा की वो इस विधानसभा सत्र में मंत्री जी के माध्यम से सदन में रखेंगे. जो की पूरी तरह से तैयार है. इसी आश्वासन के साथ उन्होंने अपना भाषण समाप्त किया. फिर सभी लोगों को गरीब क्रांति अभियान का मोमेंटो देखर सम्मानिंत किया गया, सभी सदस्यों का मंचासीन अतिथियों के साथ एक सामूहिक फोटो लिया गया और चकबंदी दिवस का कार्यक्रम एक सफलता के साथ समाप्त हुआ. फिर सभी लोग एक दूसरे के साथ तस्वीर लेने लगे और इस मौके को यादगार बनाने लगे.
कार्यक्रम समाप्ति के बाद हम लोग सब सामान एकत्रित कर आश्रम की और चल दिए. रास्ते में स्थित गैरसैण फ्रेस कंपनी में पहुंचे और उनसे उसकी जानकारी लेने लगे. श्री रावतजी ने हमे अपनी सभी मशीनों से परिचित करवाया और बताया कि किस तरह से पहाड़ में स्वरोजगार शुरू किया जा सकता है. तब तक करीब ४ बज चुके थे. फिर हम लोगों ने गैरसैण घूमने का कार्यक्रम तय किया. हम लोगों के साथ कुलदीप नेगी, अमित गुसाईं और गैरसैण फ्रेस के रावतजी भी चल दिए. जो कि वहां के निवासी थे और हम लोगों के लिए एक गाइड की तरह सभी जगहों से अवगत कराने लगे. हम लोग गैरसैण से १७ किमी दूर बन रहे विधानसभा भवन की और रवाना हुए. वहां से ठीक सामने दूधातोली पर्वत दिखाई दे रहा था. उन्होंने बताया की इस पर्वत से रामगंगा, पुर्वी नयार और पश्चिमी नयार निकलती है. जो जी उत्तराखंड के किसानों के लिए एक वरदान हैं. फिर हम लोग विधानसभा के गेट पर पहुंचे और अंदर जाकर देखने के लिए आज्ञा मांगने लगे, किंतु हम लोगों को आज्ञा नहीं मिली. फिर कुलदीप भाई ने कहा कि २ किमी आगे हैलीपैड है, जहाँ से निर्माणाधीन पूरे विधानसभा भवन और गैरसैण को देखा जा सकता है. तो हम लोग हैलीपैड चल पड़े. वहां से नजारा देखने लायक था. पूरा गैरसैण और आस पास का क्षेत्र देखा जा सकता था. नजारा बहुत ही अच्छा था, और धीरे-२ शाम ढल रही थी जो कि पहाड़ों की सुन्दरता को और भी अधिक बढा रही थी. फिर हम लोगों कुछ तस्वीरे कैमरे में कैद की और वापस लौटने लगे. रात होने लगी थी और हल्की-२ ठंड भी, फिर हम लोग एक दुकान पर रुके जहाँ पर एक बोड़ी (बुजुर्ग महिला) और उनकी बहु जो की चाय की दुकान चलाकर अपना परिवार चला रहे थे. हम लोगों के लिए चाय बनाई और प्यार और आशीर्वाद दिया. फिर हम लोग आश्रम आ गए. फिर सब लोग गणेश “गरीब” जी और मंगल सिंह नेगी जी से मिले और वो सभी सदस्यों के साथ वार्ता करने लगे. चकबंदी अभियान को किस तरह सफल बनाया जाय और आगे की क्या रणनीति होगी इस पर चर्चा होती रही. फिर खाना खाने के लिए बुलावा आ गया और सब लोग खाने के लिए चल पड़े. खाने के बाद फिर चर्चा शुरू हुई. सभी लोग एक-२ कर अपनी-२ बात रखने लगे और रात्रि के करीब ११ बजे तक चर्चा जारी रही. फिर सब लोग सो गए.

सुबह सब लोग तैयार होने लगे और सभी एक-दूसरे से अगले कार्यक्रम तक विदाई लेने लगे और फिर मिलने का वादा कर अपने-२ गंतव्य की और रवाना हो गए. हम लोग भी अब वापस दिल्ली की और अग्रसर हो गए. हम लोग पहले ही तय कर चुके थे कि हरिद्वार के रास्ते जायेंगे. फिर हम लोग आदिबद्री मंदिर पहुंचे. जो कि पंच-बद्री में से एक है. वहां पर रुक कर हमने भगवान के दर्शन किए. पुजारी जी ने बताया कि यहाँ पर १६ मंदिर थे, जिनमे से अब १४ मंदिर ही बचें हैं. फिर वहां से हम लोग कर्णप्रयाग पहुंचे. वहां पर रुके नहीं और आगे गौचर बाजार में रूके. २ मार्च हो हमारे साथी अनूप पटवाल का जन्मदिन था. बाजार में रुककर हमने होटल में अनूप भाई का जन्मदिन मनाया और वहां पर सभी लोगों को केक बांटा. फिर हम लोग नास्ता कर आगे बढे. अलकनंदा नदी के किनारे-२ सड़क पर रुद्रप्रयाग-देवप्रयाग होते हुए हम लोग श्रीनगर पहुंचे. वहां से थोडा आगे कलियासौड़ जगह है. जहाँ पर माँ धारी देवी का मंदिर है. हम लोग वहां पर रुके, और मंदिर में पहुंचे. माँ धारी देवी के दर्शन किए और प्रार्थना की कि हम सभी लोगों के साथ-२ सभी प्रदेश वासियों पर अपनी कृपा रखें. माँ की मूर्ति बहुत ही आकर्षक और मनभावन थी. जिसे देखते रहने का मन कर रहा था. किंतु समय का अभाव भी था और हम लो दिल्ली भी पहुंचना था. वहां से हम लोग ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार पहुंचे. वहां पर हमारे एक मित्र कुंदन जी हमारा इंतजार कर रहे थे. हम लोग हरि की पैड़ी पहुंचे. जहाँ पर अर्ध-कुंभ के चलते बहुत भीड़ थी और शाम हो चली थी और गंगा आरती का वक्त हो चला था. फिर हम सभी ने गंगा-स्नान किया. पानी काफी ठंडा था. अनूप पटवाल और राकेश रावत भाई तैरकर दूसरी छोर गए. फिर मैं भी उनके पीछे तैरकर पार पहुँच गया. पानी में बहुत तेज बहाव था. फिर हम लोग स्नान कर बोतल में गंगा जल लेकर वापस गाड़ी की और चल दिए. जहाँ पर एक होटल में कुंदन जी ने हमे चाय और समोसे खिलाए. फिर हम लोग उनसे विदा लेकर दिल्ली रवाना हो गए. रात्रि के करीब १० बजे हम लोग गाजियाबाद पहुंचे. मैं (अनूप रावत) वहीँ पर उतर गया. क्योंकि वहां पर मुझे अपने चचेरे भाई के घर जाना था. सभी मित्रों से फिर मिलने का वादा कर मैं गाड़ी से उतर गया. फिर मैंने घर पहुँच कर सब साथियों को सूचित कर दिया. फिर राकेश रावत जी को उन्होंने उनके घर के समीप उतार दिया और बाकी लोग द्वारका पहुँच गए. फिर सब अपने-२ घर पहुँच चुके थे. फिर सोशल मीडिया के माध्यम से सभी ने अपने-२ घर पहुँचने की सूचना दी. इस के साथ ही यह सफल और सुंदर यात्रा समाप्त हुई...

Tuesday, February 2, 2016

शीर्षक : ब्याली तक जु निवासी छाई

शीर्षक : ब्याली तक जु निवासी छाई
ब्याली तक जु निवासी छाई, उ आज प्रवासी ह्वेगे।
जल्मभूमि छोड़ी की उ, बिरणों का यख चलिगे।।

हिटणु क्या जी सीख योन, सभ्या दौड़ी गैना।
बचपन अपडू काटी जख, वै घौर छोड़ी गैना।।
ज्वानि की रौंस मा अपडू, बचपन यखी छोडिगे।
ब्याली तक जु निवासी छाई, उ आज प्रवासी ह्वेगे।।

कूड़ी पुंगड़ी बांजी अर छोड़ियाल गौं गुठ्यार।
झणि किलै चुभण लग्युं, यूँ थै अपडू ही घार।।
डाली-बोटि पौण-पंछी देखा, धै लगान्दी रैगे।
ब्याली तक जु निवासी छाई, उ आज प्रवासी ह्वेगे।।

पुरखों की कूड़ी छोड़ी, किराया मकान मा रैणा छन।
खेती-बाड़ी छोड़ी ऐनि, यख ज़िंगदी धक्याणा छन।।
घौर बिटि भै-बंधु मा, यु पार्सल मगांदी रैगे।
ब्याली तक जु निवासी छाई, उ आज प्रवासी ह्वेगे।।

उकाल बिटि उन्दरी मा जाणा की, कनि दौड़ लगि च।
कुछ देखा-देखि त, कुछ मजबूरी भी च।।
क्वी पढ़ै कु क्वी रोजगार कु, बानु बणे छोड़ि गे।
ब्याली तक जु निवासी छाई, उ आज प्रवासी ह्वेगे।।

© 08-11-15 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल,पौड़ी, उत्तराखंड

Monday, January 11, 2016

गढ़वाली शायरी - Anoop Rawat


घोळ छोडि की उड़िगे अब पंछी,
फोटो देखि की किलै छै अब रुणी।
जब त्वे बोलि छौ तिल पछतौण च,
तब त्वैंन मेरी एक बात नि सूणी।।

सर्वाधिकार सुरक्षित - अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

Sunday, December 27, 2015

कतगा बदल गया अब उत्तराखंड


शीर्षक : कतगा बदल गया अब उत्तराखंड

कुछ दिन पैले गया था पहाड़ में,
जो कुछ देखा तुम्हें बता रहा हूँ।
कतगा बदल गया अब उत्तराखंड,
तनि इस कविता में बिंगा रहा हूँ।
लिख्वार नहीं हूँ पर लिख लेता हूँ,
आखर बिटोळ के गठ्या रहा हूँ।1।

रंग-बिरंगे लारा-लत्ते पहने,
अंग्रेजी स्कूल जाते बच्चे देखे।।
काका-काकी, ब्वाड़ा-बोड़ी को,
अंकल-आंटी बुलाते देखे।।
गढ़वाली तो कतई नहीं बच्याते,
हिंदी-अंग्रेजी में छ्वीं लगाते देखे।2।

ब्यो बाराती का हाल तो देखो,
दारु की तो गदेरी ब्वगा रहे थे।
ढोल दमो रणसिंघा मसूबाज छोड़ि,
नयु जमानु का डी जे बजा रहे थे।
गढ़वाली गाने में दाने लोग नाचते और,
ज्वान हिंदी पंजाबी में कमर हिला रहे थे।3।

बजार गयुं त गजब सीन देखा,
चाऊमीन बर्गर मोमो बिकते देखे।
च्या बणाएगा कौन अब तो,
पेप्सी लिम्का कोक बैठि पीते देखे।
हक़-बक तो तब रै गया मैं जब,
ह्युंद में आइसक्रीम खाते देखे।4।

ब्याली तक जो घ्वडेत था,
आज वो डरेबर बण गया है।
बखरेल था जो ब्याली तक,
वो आज ठेकेदार बण गया है।
अर जैल ठेली नि साकु दस,
उ आज प्रधान बण गया है।5।

स्कूल का तो हाल क्या बिंगाऊँ,
टुप दो मास्टर अर बच्चे आठ हैं।
भोजनमाता ऐकि भात-दाल पकाती,
घाम तपणा कु काम यूंक ठाठ हैं।
पढे-लिखे भगवान का भरोसा,
पर्सनल छुट्टी साल मा साठ हैं।6।

विकास का नौ कु बानु बणे की,
सर्यां पहाड़ उजाड़ी याला है।
सड़क बणी है कच्ची-पकी,
पैदल अब क्वी नहीं जाणे वाला है।
द्वी लतडाक का बाटू था जख,
टैक्सी बुक करि के अब जाणा है।7।

खेती पाती अब बांजी हो गयी,
राशन बजार बिटि ल्याण है।
खुद काम कन मा शर्म लगती,
नेपाल से डुट्याल बुलाण है।
अफ नि खाने क्वादा झुंगरु,
परदेश में ये सब भिजवाने हैं।8।

ढुंगु से बणी कूड़ी उजाड़ के अब,
ईंटों अर सीमेंट का मकान बना रहे हैं।
ढुंगु का मिस्त्री हेल्पर बना है,
और बिहारी मिस्त्री ईंट मिसा रहे हैं।
न तिबारी, न डिंडाळी, न पट्वले,
अब तो लोग लेंटर डाळ रहे हैं।9।

अब जब फिर जाऊंगा पहाड़ में,
फिर तुम्हें आके बिंगाउँगा।
बदलेंदा ज़माने की तस्वीर को,
आखर गठे की कविता सजाऊंगा।
रावत अनूप को बहुत प्यारा उत्तराखंड,
जय उत्तराखंड गीत सदानि गाऊंगा।10।

©23-12-2015 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

Thursday, December 10, 2015

गीत : मिथै बाँसुली ना रुवायो

गीत : मिथै बाँसुली ना रुवायो

मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....
मिथै बाँसुली ना रुवायो, गैल्या ना बजाऊ बाँसुली,
गैल्या ना बजाऊ बाँसुली ..... ..... .....
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....

डांड्यो मा न्योली बंसणी, रौल्युं मा हिलांश,
त्वेकु मेरु रैबार देणु, आणि च घुघुती .....
हो डांड्यो मा न्योली बंसणी ..... ..... .....
आंख्युं का आँसु सुखिगे, रोई-रोई मेरा ...
झठ बौडि आवा स्वामी, गीत बाजूबंद सूणी...
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....

स्वामी यखुली परदेशा, मी यखुली पहाड़ा,
निठुर ड्यूटी तुम्हारि, ख़ुशी देखि नि पाणु छु...
हो स्वामी यखुली परदेशा ..... ..... .....
होलि दगड़ी झणि कब, य तुम्हारि मेरी जोड़ी...
रौंला संग-संग हम, ऊ भलु दिन बार आलु ...
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....
गैल्या ना बजाऊ बाँसुली ..... ..... .....

©09-12-2015 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
इंदिरापुरम, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
www.iamrawatji.blogspot.in

Wednesday, November 18, 2015

शीर्षक : चकबंदी अब कैरी द्यो

शीर्षक : चकबंदी अब कैरी द्यो

कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।
गणेश 'गरीब' जी की, बात जरासी सूणी ल्यो।।
हूणु पलायन यख बिटि, चकबंदी अब कैरी द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।

ऐंसु न भ्वाला साल, सूणी-सूणी थकी ग्यावा।
जनमानस की बात थैं, टक्क लगै की सूणी ल्यावा।।
होरी जगह ह्वेगे चकबंदी, यख भी अब कैरी द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।

क्वी यख क्वी वख, क्वी ये छाल क्वी वै छाल।
इनै उनै जांण मा ही, सरया गात जलै याल।।
एक ही समणी सभ्या पुंगडा, हमरा अब कैरी द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।

चकबंदी ह्वे जाली त, बांजा पुंगडा चलदा होला।
होलु खूब अनाज यख, भैर किलै छोड़ी जौंला।।
द्वी चार ख़ुशी का फूल, हमरा जीवन मा ढोली द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।

नेतागिरी छोड़ी की आज, जरा मनख्यात रैखि ल्यावा।
तुम्हरा ही भै-बंधु हम, बिरोधी नी छावा।।
गरीब क्रांति आंदोलन की बात, झटपट सूणी ल्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।

© 07-11-2015 अनूप सिंह रावत
ग्वीन, बीरोंखाल, पौड़ी, उत्तराखंड
www.iamrawatji.blogspot.in

Tuesday, July 14, 2015

नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार

रिखणी-बीरोंखाल धुमाकोट थैलीसैंण नैनीडांडा.
मिलै की नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार.
हम थैं नि चयेन्दु स्यु तुम्हारु कोटद्वार...

जब राज्य पहाड़ी बणे त जिला किलै ना?
सुपिन्या दिख्यां विकास का विकास कतै ना!
रंगीला पिंगला सुपिन्या दिख्यां करि द्यो साकार...

पैली जिला मुख्यालय दूर च फिर दूर बणाणा किलै?
समणी बणे द्यो मुख्यालय यूं खण्डों थै मिलै!
सुविधा मिलि सकद यखी त फिर किलै जाण कोटद्वार...

हूणु पलायन यख बिटि ज़रा इनै भी देखि ल्यावा.
चिंगारी बणी जौ न मशाल जिला पैली बणे द्यावा.!
कख बणाण जिला जरा सुणि ल्यो जनता का विचार...

गर बणे सकदा त अलग पहाड़ी जिला बणे दियां.
कोटद्वार नि चयेन्दु हमथै नथर पौड़ी ही रैण दियां..
पछ्याण पहाड़ी रैण दियां हमारी अर गढ़वाली अन्वार...

नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार...
नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार...

©13-07-15 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

Thursday, June 25, 2015

धन्यवाद तेरु रूड़ी


धन्यवाद तेरु रूड़ी,
त्यारा कारण परदेशी आई.
टुप द्वी दिनों कु ही सै,
अपड़ी देवभूमि भेंटे ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
बाल बच्चों दगड़ी आई.
छुट्यों का बाना ही,
अपडू गौं मुलुक देखि ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
ढोग्यां द्वार खोलि ग्याई.
चौक तिबारी साफ कैरी,
भैर भितर सब हेरी ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
देवी देवतों सेवा लगे ग्याई.
हिंशोला-किन्गोड़ा, काफल, आडू,
सब्बी धाणी खै ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
आपस मिंत्र भेंटी ग्याई.
दाना सयाणा देखि की,
परदेश का बाटा पैंटी ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
इनि सदानी आंदी रैई.
मेरा भाई-बंधु थैं,
यनि पहाड़ बुलान्दी रैई...

©22-06-15 अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी, उत्तराखंड

Wednesday, May 13, 2015

ह्युंद बीति ग्याई, रूडी लगी ग्याई

ह्युंद बीति ग्याई, रूडी लगी ग्याई.
न तुम आयां घौर, न रंत रैबार आई...

स्या कनि ड्यूटी तुम्हारी, बगत नी च.
पापी पेट का बाना, कनु बिछड़ो कर्युं च.

बाटू देखि-२ अब त, आंखी थकी गैनी.
कब तक स्वामी इना, दूर-२ दिन कटैनी.

खुद मा तुम्हारी झूरी-२ पराण आधा ह्वेगे.
राजी रयां तुम आस कुल देवतों मा रैगे.

झठ बौडी आवा स्वामी अब नि रयेंदु.
यखुली तुम बिगैर ए पहाड़ मा नि जियेंदु.

जारी है ...............

© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक : ०१-०५-२०१५ (ग्वीन मल्ला)