Tuesday, June 26, 2018

रैबार


रैबार भेजि त छै
पर मिलु नि वों थै झणि
तबि नि आया अजों तळक
य फिर सब कुछ समझिकी
अणसुण्या कन्ना होळा
कि कब बिटि छौं जग्वाळ
तौं कि मुखुड़ि देखणा कु
चैंठी कि भुकि पेणा कु
बस इतगा त चांदु मी कि
जब तळक साँस चलिणी च
य कूड़ी इनि टिकी च
तुम आणा-जाणा रावा...

©® 2018 अनूप सिंह रावत

Friday, May 25, 2018

सुपिन्या


सुपिन्या भि कभि-कबार
बकि-बाता का ह्वे जांदी
जनु कि ब्याळि रात ह्वे
क्या देखुणु छु कि
खाली पड्यां गौं-गुठ्यार
फिर से भ्वर्याँ छन
वल्या पल्या छाल फिर
मनिख्यों कु घपरोल
बांजा प्वड़्यां पुंगिड्यों म
धाण-काज करदा लोग
बाजारों म भारी रौनक
आंदा-जांदा बटोयों बहार
पंदेरों म बंठों की लैन
बांसुली बजांदा ग्वरेल
हैंसदा खेलदा गांदा गीत
मुल्क की निभांदा रीत
कच्ची पक्की सड़क दिखे
तौं पर हथ जोड़ि वोट मंगदा
जनि मिथै एक नेता दिखे
तनि फट्ट निंद टूटिगे
मनमोहण्या सुपिन्यु मेरु
झणी कख हर्चिगे !!!

©®2018 अनूप सिंह रावत

Friday, May 4, 2018

ऐंसु फिर रूड़ी ऐ ग्याई


ऐंसु फिर रूड़ी ऐ ग्याई
घौर-बोण कना कु
फिर से बगत ऐ ग्याई
स्कुल्यों की छुट्टी बाद
जु गौं म छन उ
बोण जाणा कु तैयार
अर जु परदेश छन
उ गरम्यों मा घार
पहाड़ का मनखी
खैरि फटाणा कु जाणा
अर परदेशी गौं भेंटि
खुद मिटै कि आळा।

© ® Anoop Singh Rawat

Wednesday, April 25, 2018

चला भै स्कूल जौंला


चला भै हम सभ्या स्कूल जौंला
द्यू जल्यूं च बल तख ज्ञान कु
उज्याळो हम भी उकरी ल्योंला
पैलि सिखला आखर हम सब
फिर तौं गठ्याणों सीखि जौंला

कविता जारी है .....

©® अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"

Wednesday, March 28, 2018

About Anoop Rawat by Bhishma Kukreti Ji


Anoop Singh Rawat: A Promising Garhwali Poet and a Blogger
(गढ़वाल, उत्तराखंड, हिमालय से गढ़वाली कविता क्रमगत इतिहास भाग -236)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, Part ::)
By: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
-
Anoop Singh Rawat is one of the promising young Garhwali poets interested in taking Garhwali poetry on its zenith.
Anoop knows that in modern time, internet is one the most promising medium for promoting small population spoken language as Garhwali. That is the reason he started his own blog (Meru Muluk Meru Paran. www.iamrawatji.blogspot.in).
Anoop Rawat was born in Gween Malla, Khatali, Bironkhal of Pauri Garhwal in 1989. Anoop Rawat is post graduate and interested in digital media.

Humanity, Social reforms and Garhwal are major concerns for young Garhwali poet Anoop. He discusses Chakbandi, foeticide, development and many more subjects as love, philosophy, spirituality, patriotism.
हे गितांग दिदा जरा चकबंदी कु गीत लगै दे poem shows his concern for social and agriculture reforms in Garhwal hills.

His one of the best social concern poems is about foeticide -
कन्या भ्रूण हत्या पर कुछ पंक्तियाँ (गढ़वाली कविता भाग )

आणि दे वीं ईं दुनिया मा, जींणी दे वीं ईं दुनिया मा
क्या चा वींकु दोष ज्वा ह्व़े व बेटी जात
कुछ त डैर वे बिधाता से राखी ले मनख्यात

आज की दुनिया मा बेटी बेटा बराबर चा
ध्यान से देख फर्क नीचा कुछ भी द्वियु मा
टक्क लगे सुणी ले अनूप रावत कि या बात
क्या चा वींकु दोष ज्वा ह्व़े व बेटी जात
कुछ त डेर वे बिधाता से राखी ले मनख्यात

तीलू, रामी, गौरा ह्वेनी बड़ी-२ नारी
जौन करी काम यनु दुनिया दे तारी
छाया सभ्या यु भी रे मनखी नारी जात
क्या चा वींकु दोष ज्वा ह्व़े व बेटी जात
कुछ त डेर वे बिधाता से राखी ले मनख्यात

Anoop also creates humor and satire in his Garhwali poetry as under –
उन त मि
नौन्युं देखि
भारी सरमांदू छौं
पर कबि फेसबुक मा
जरा सि चैट कै देंदु…

Anoop Rawat uses lyrics, poems and Ghzals for his illustration.
It is clearly visible effects of Salani Garhwali dialects in poems by Anoop Rawat.
Anoop uses old Garhwali phrases (खैरी खांदा खांदा) and new phrases (फूल माला रिबन कटे उद्घाटन ह्वे गे) too for illustrating his poems.
There are mostly all types of images in the poems by Anoop. His uses of symbols make perfect images.
Poetry critic Dr. Manjula Dhoundiyal claims that Anoop has tremendous potentiality for Garhwali poetry world.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2017

Tuesday, March 20, 2018

एक कवि सम्मेलन मा


एक कवि सम्मेलन मा
तब गजब ह्वे ग्याई
जब वूं ळ मिथे भि
मंच पर बुलै द्याई
हम त सुनणा कु गयां छाया
पर हम थैं अपड़ी कविता
सुणान कु ब्वले ग्याई …

पैलि त मी जरा डैरी ग्यों
पर तौं न हौंसला बढै
फेसबुक मा बल तुम
खूब कविता पोस्ट करदो
आज यखम भी सुणे द्यो
मिन भी फट्ट मोबेल म देखि
कविता सुणे द्याई ...

पैलि-२ दौं कविता पाठ कार
थोड़ा भौत गलती भि ह्वाई
लोगों थैं कविता पसंद आई
अर दगड़ा दगडि सभ्या
मंचासीन धुरंधर कविगणों ळ
निरंतर अगिन्या बढ़णा कु
आशीष मैं थैं दे द्याई ...

©® अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक: 20-03-2018 (मंगलवार)

Wednesday, January 17, 2018

देखि ब्याळी मिन


देखि
ब्याळि मिन
एक स्वाणी बाँद
देखदि रैग्युं वीं मी
जून सी उज्याळु रूप रंग
उन त पैळि भी देखि बांद
पर वींकि बात ही कुछ होरि छै
वा जनि स्वर्ग सी अप्सरा आई धरती मा
सोचि नि छौ कभि माया का बाटों अळिझे जौंळु
पर आखिर ज्वनि क उमाळ मा मी घसड़क रैड़ि ग्युं।

© 17-01-2018 (बुधवार)
अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"

Thursday, January 4, 2018

महाभारत - कलजुग मा

महाभारत,
कलजुग मा भी
सतत जारी च।
शकुनि मामा,
नेतों कु अब
भेष धारी च।।

द्वापर मा लड़ै
पांडव - कौरव।
अब ये जुग मा,
जाति अर धर्म
का नौ पर यु,
मनिख्यों लड़ाना।
अर सत्ता थैं अफि
लग्यां हत्याणा।।

द्रौपदी का जनि,
अब भारत माँ
लगीं च दाँव पर।
अर हम पार्ट्यों
का पिछिन्यां,
नि छौ चिताणा।
अर यु चटेळी कि
मौज छन उड़ाणा।।

© अनूप सिंह रावत
ग्वीन, बीरोंखाल, गढ़वाल (उत्तराखण्ड)
दिनांक: 04-01-2018 (बृहस्पतिवार)

Thursday, December 21, 2017

उन त मी


उन त मी
भौत शरीफ़ छौं
पर कभि - कभार
भौं तड़तड़ी कैरि
बौंला भी बिटै देंदु।।

उन त मी
दारू नी पेंदु
पर कभि - कभार
ब्यौ बरात्यों म फ्री की
खूब घतोली देंदु।।

उन त मी
खांदू पेंदु नि छौं
पर कभि - कभार
जब दावत मा जांदू
त छकै खै जांदू।।

उन त मी
नौन्यु देखि की
भारी सरमांदु छौं
पर कभि फेसबुक मा
जरासी चैट कै देंदु।।

उन त मी
गढ़वळि ही बोलदु
पर कभि - कभार
हिंदी अर अंग्रेजी मा
खूब बचै देंदु।।

उन त मी
राजनीति नि जणदु
पर कभि - कभार
नेतों का जनि बात
लोगों समणी बोलि देंदु।।

..... कविता जारी है .....

© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक: 21 दिसम्बर 2017 (बृहस्पतिवार)
ग्वीन, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)

Thursday, December 7, 2017

कागज पर कलम

कागज़ पर कलम कभि, मी भी घिसि देन्दु।
देखुदु छु जु कुछ, वै मी कभि उकेरी देन्दु।।

सदनी प्यार प्रेम लिखणा की कोशिश करुदु।
पर क्या कन्न, ये कलजुग मा वास करुदु,
इलै कभि-2 ईंट कु जबाब ढुंगल दे देन्दु।।

कभि डांडा कांठो का बारा मा लेखदु।
कभि-2 पहाड़ का मनिख्युं का बार मा।
त यख का रीति रिवाज भी लेखि देन्दु।।

कभि क्वी आंछिरी सी बांद देखि,
रंग-रूप, रंगिलु मिजाज वींकु देखि।
मायादार बणी गीत माया का लेखि देन्दु।।

नेताओं का खोखला वादों पर लेखुदु।
जनता थै कन्ना रिंगोणा अपड़ा जाल मा।
तौंकि भ्रष्टाचार की किताब खोलि देन्दु।।

दाना-बुढ़यों दींणा आशीर्वाद लेखुदु।
त ज्वानु अर छ्वटों कु प्यार लेखुदु।
कभि नारी कु गुणगान भी लेखि देन्दु।।

कलम ब्वनि तू मी इनि घिसणी रै।
अनूप आखर से आखर गठ्याणी रै।
कुछ होरि न त इनि मी भी कै देन्दु।।

© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)
www.iamrawatji.blogspot.in

Friday, November 24, 2017

ब्वाला कब तक ?


ब्वाला कब तक ?

वादा करयूं छौ मुलुक कु विकास क़ु,
जग्वाल कारली जनता, ब्वाला कब तक?

रंगिला- पिंगला, सुपिन्यां देख्यां जु,
सुपिन्या साकार ह्वाला, ब्वाला कब तक?

जोड़- जुगन्त कैरि बहुमत मिलिगे,
जनता कु बेड़ा पार, ब्वाला कब तक?

योज़ना बणी च ज्वा कागजों मा,
ज़मीन पर पूरी होळी, ब्वाला कब तक ?

डिग्री-डिप्लोमा सब कैरी याळ,
रोजगार मिळालु, ब्वाला कब तक?

फूलमाला पैनी रिबन कटे उद्घाटन ह्वेगे,
काम-काज होळु पूरू, ब्वाला कब तक?

खैरि खाँदा-खाँदा, गरीब मिटे गे,
पर ग़रीबी मिटेली, ब्वाला कब तक?

रूड़ी सी ह्वेगे ज़िंदगी किसान की,
मौल्यार आळु जीवन मा, ब्वाला कब तक?

देहरादून बल ख़ूब हूणी च बैठक,
विधायक जी पहाड़ आला, ब्वाला कब तक?

जाति-धर्म मा बांटी याळ जनता,
राजनीति इनि हूणी रैली, ब्वाला कब तक?

© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक: 24-11-2017 (शुक्रवार)

Thursday, November 16, 2017

चकबंदी - एक उम्मीद


उत्तर भारत के हिमालयी राज्यों में से एक उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है. यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता जितनी खूबसूरत है, ठीक यहाँ का जीवन उतना ही कठिन है. क्योंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ जीवन यापन आसान नहीं है. उत्तराखंड राज्य 9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया था, जिसकी माँग बहुत समय से हो रही थी. इससे पूर्व यह पर्वतीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश राज्य का एक अंग था. यहाँ के निवासियों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने से से यहाँ का विकास होगा और लोगों के जीवन में खुशियों की बौछार होगी. किंतु राज्य बनने के 17 वर्षों के बाद भी, अभी भी स्थिति करीब-२ वैसी ही बनी हुई है. जिसका कारण अभी तक की सरकारों का उदासीन रवैया रहा है. यहाँ की सरकारें राज्य को ऊर्जा प्रदेश, पर्यटन प्रदेश बनाने पर ही लगे हुए हैं. कोई भी यहाँ के आजीविका के मुख्य स्रोत कृषि (किसानी) पर ध्यान नहीं दे रहा है. कभी कभार कोई नेता चुनाओं के मध्यनजर इसकी बात करता है और चकबंदी की बातें करके वोट बटोर लेता है किंतु चुनाव उपरांत चकबंदी को भूल जाते हैं.

उत्तराखंड में आजीविका का मुख्य स्रोत प्रारम्भ से ही खेतीबाड़ी रहा है. इसके अलावा सेना और अर्धसैनिक बलों में भी यहाँ के युवाओं को रोजगार के साथ-२ देश की सेवा करने का मौका रहता है. किंतु समय के साथ-२ कृषि क्षेत्र में यहाँ के लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है क्योंकि जंगली जानवर खेती को बहुत नुकसान पंहुचा रहें हैं. जिससे लोग अब खेती से लगातार दूर हो रहे हैं. पारम्परिक खेती में होते नुकसान और सरकारी नौकरी में चयन न होने की स्तिथि में यहाँ से लोग लगातार पलायन कर रहे हैं. क्योकि जब लोगों के पास रोजगार का कोई साधन नहीं होता है तो उनको पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है. जिसमें यहाँ के लचर शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं पूरा साथ दे रहीं हैं और पलायन करने पर मजबूर कर रही हैं. अब खेती को पुनः बचाने और लोगों के पारम्परिक रोजगार को बचाने का एकमात्र उपाय चकबंदी ही है. जिसकी मांग राज्य बनने से पूर्व से ही लगातार हो रही है.

उत्तराखंड राज्य का 86% हिस्सा पर्वतीय है और 65% जंगलों से ढका हुआ है. यहाँ पर खेती सीढ़ीदार खेतों पर होती है. यहाँ के खेत बिखरे हुए हैं और परिवारों के विभाजन से एक परिवार की खेती 10 से 20 जगहों पर हैं. जिससे खेती करने में ज्यादा श्रम और लागत आती है. खेती तब ही अच्छी हो सकती है जब खेत एक सामने हों और इसका एकमात्र उपाय चकबंदी है. एक जगह चक हो जाने से यहाँ श्रम भी बचेगा और लोग अपनी योजना के अनुसार खेती कर सकते हैं. यहाँ के खेत उपजाऊ तो हैं किंतु सही से भूमि बंदोबस्त न होने के कारण किसानों को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

अगर उत्तराखंड के पर्वतीय भू-भाग में चकबंदी की जाती है तो फिर यहाँ के किसान भी आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से होने वाली खेती को आजमा सकते हैं और इसी भूमि पर अच्छी खेती कर सकते हैं. चकबंदी से खेती - बाड़ी में ही स्वरोजगार उत्पन्न हो सकता है. क्योंकि यहाँ की जमीन ही यहाँ का स्थाई रोजगार है. यहाँ के पारंपरिक रोजगार जो की बंद होने के कगार पर हैं उनको भी पुनः खड़ा किया जा सकता है. क्योंकि खेती से जुड़े बहुत रोजगार अब बंद हो रहे हैं, खेती में इस्तेमाल होने वाले औजारों का निर्माण करने वाले लुहार (शिल्पी) या फिर रिंगाल से वस्तुएं बनाने वाले "रुड्या" हों, इनका रोजगार पुनः शुरू हो सकता है. साथ ही यदि यहाँ से पलायन रुक जाता है तो कुटीर शिल्प, धातु शिल्प, ताम्र शिल्प, काष्ठ शिल्प, वस्त्र शिल्प, पशुपालन आदि से जुड़े लोगों को भी रोजगार मिल जायेगा, जो कि पलायन होने से लगातार गिरता जा रहा है. सरकारी योजनाओं के साथ यदि पारंपरिक रोजगार भी रहेगा तो यहाँ के लोगों का जीवन खुशहाल हो सकता है और पलायन और बेरोजगारी को रोका जा सकता है.

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में चकबंदी से खुशहाली आ सकती है. यदि यहाँ की सरकार यहाँ पर भूमि बंदोबस्त करती है तो हरित क्रांति को सच में उत्तराखंड के इस भू-भाग पर नया आयाम मिल सकता है. चकबंदी हो जाने से कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्र के लोग बहुत मेहनती होते हैं और उनको यहीं पर उनकी मेहनत का अच्छा परिणाम मिल सकता है. हर किसी परिवार का अपना चक हो जाने ये कृषि उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है, खेती से ही यहाँ के प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाया जा सकता है. कृषि व्यवस्था को दुरुस्त करने, पलायन और बेरोजगारी को रोकने के लिए चकबंदी एक उम्मीद है.

गरीब क्रांति अभियान (उत्तराखंड) लगातार चकबंदी के प्रति लोगों को जागरूक कर रहा है और समस्त उत्तराखंड में चकबंदी जागर यात्रा और गोष्ठियों का आयोजन कर रहा है. यदि उत्तराखंड सरकार अपने स्तर पर लोगों में चकबंदी की जागरूकता और अनिवार्य चकबंदी करवाती है तो एक दिन उत्तराखंड जरूर कृषि के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकता है. चकबंदी से कृषि और बागवानी में कैसे आगे बढ़ा जा सकता है इसका उदहारण हमारा पडोसी राज्य हिमाचल प्रदेश है, जहाँ पर उत्तराखंड की ही तरह परिस्तिथि है. चकबंदी जो जाने से यहाँ के किसान भी जड़ी-बूटी, पुष्पोत्पादन, सुगंध पादन, मसाला उत्पादन की राह पर आगे बढ़ सकता है. एक सामने चक हो जाने से साथ ही लोग मौनपालन, पशुपालन, मत्स्यपालन, वानिकी आदि क्षेत्रों में भी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं. चकबंदी यहाँ खुशहाली की उम्मीद नजर आती है. चकबंदी से स्वालंबन के धारणा को भी जीवित किया जा सकता है और पहाड़ एक बार फिर सम्पन्नता की राह पर निकल पड़ेगा। इसलिए आज के समय की मांग चकबंदी है, जिसके जरिए भूमि सुधार करके उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्से में खुशहाली आएगी.

दिनांक: 16 नवम्बर 2017
अनूप सिंह रावत (चकबंदी समर्थक)
ग्राम व पो. ओ. ग्वीन मल्ला
विकासखंड - बीरोंखाल (खाटली)
जिला - पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखंड – 246276
rawat28anu@gmail.com