घोळ छोडि की उड़िगे अब पंछी,
फोटो देखि की किलै छै अब रुणी।
जब त्वे बोलि छौ तिल पछतौण च,
तब त्वैंन मेरी एक बात नि सूणी।।
सर्वाधिकार सुरक्षित - अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
शीर्षक : कतगा बदल गया अब उत्तराखंड
कुछ दिन पैले गया था पहाड़ में,
जो कुछ देखा तुम्हें बता रहा हूँ।
कतगा बदल गया अब उत्तराखंड,
तनि इस कविता में बिंगा रहा हूँ।
लिख्वार नहीं हूँ पर लिख लेता हूँ,
आखर बिटोळ के गठ्या रहा हूँ।1।
रंग-बिरंगे लारा-लत्ते पहने,
अंग्रेजी स्कूल जाते बच्चे देखे।।
काका-काकी, ब्वाड़ा-बोड़ी को,
अंकल-आंटी बुलाते देखे।।
गढ़वाली तो कतई नहीं बच्याते,
हिंदी-अंग्रेजी में छ्वीं लगाते देखे।2।
ब्यो बाराती का हाल तो देखो,
दारु की तो गदेरी ब्वगा रहे थे।
ढोल दमो रणसिंघा मसूबाज छोड़ि,
नयु जमानु का डी जे बजा रहे थे।
गढ़वाली गाने में दाने लोग नाचते और,
ज्वान हिंदी पंजाबी में कमर हिला रहे थे।3।
बजार गयुं त गजब सीन देखा,
चाऊमीन बर्गर मोमो बिकते देखे।
च्या बणाएगा कौन अब तो,
पेप्सी लिम्का कोक बैठि पीते देखे।
हक़-बक तो तब रै गया मैं जब,
ह्युंद में आइसक्रीम खाते देखे।4।
ब्याली तक जो घ्वडेत था,
आज वो डरेबर बण गया है।
बखरेल था जो ब्याली तक,
वो आज ठेकेदार बण गया है।
अर जैल ठेली नि साकु दस,
उ आज प्रधान बण गया है।5।
स्कूल का तो हाल क्या बिंगाऊँ,
टुप दो मास्टर अर बच्चे आठ हैं।
भोजनमाता ऐकि भात-दाल पकाती,
घाम तपणा कु काम यूंक ठाठ हैं।
पढे-लिखे भगवान का भरोसा,
पर्सनल छुट्टी साल मा साठ हैं।6।
विकास का नौ कु बानु बणे की,
सर्यां पहाड़ उजाड़ी याला है।
सड़क बणी है कच्ची-पकी,
पैदल अब क्वी नहीं जाणे वाला है।
द्वी लतडाक का बाटू था जख,
टैक्सी बुक करि के अब जाणा है।7।
खेती पाती अब बांजी हो गयी,
राशन बजार बिटि ल्याण है।
खुद काम कन मा शर्म लगती,
नेपाल से डुट्याल बुलाण है।
अफ नि खाने क्वादा झुंगरु,
परदेश में ये सब भिजवाने हैं।8।
ढुंगु से बणी कूड़ी उजाड़ के अब,
ईंटों अर सीमेंट का मकान बना रहे हैं।
ढुंगु का मिस्त्री हेल्पर बना है,
और बिहारी मिस्त्री ईंट मिसा रहे हैं।
न तिबारी, न डिंडाळी, न पट्वले,
अब तो लोग लेंटर डाळ रहे हैं।9।
अब जब फिर जाऊंगा पहाड़ में,
फिर तुम्हें आके बिंगाउँगा।
बदलेंदा ज़माने की तस्वीर को,
आखर गठे की कविता सजाऊंगा।
रावत अनूप को बहुत प्यारा उत्तराखंड,
जय उत्तराखंड गीत सदानि गाऊंगा।10।
©23-12-2015 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
गीत : मिथै बाँसुली ना रुवायो
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....
मिथै बाँसुली ना रुवायो, गैल्या ना बजाऊ बाँसुली,
गैल्या ना बजाऊ बाँसुली ..... ..... .....
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....
डांड्यो मा न्योली बंसणी, रौल्युं मा हिलांश,
त्वेकु मेरु रैबार देणु, आणि च घुघुती .....
हो डांड्यो मा न्योली बंसणी ..... ..... .....
आंख्युं का आँसु सुखिगे, रोई-रोई मेरा ...
झठ बौडि आवा स्वामी, गीत बाजूबंद सूणी...
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....
स्वामी यखुली परदेशा, मी यखुली पहाड़ा,
निठुर ड्यूटी तुम्हारि, ख़ुशी देखि नि पाणु छु...
हो स्वामी यखुली परदेशा ..... ..... .....
होलि दगड़ी झणि कब, य तुम्हारि मेरी जोड़ी...
रौंला संग-संग हम, ऊ भलु दिन बार आलु ...
मिथै बाँसुली ना रुवायो ..... ..... .....
गैल्या ना बजाऊ बाँसुली ..... ..... .....
©09-12-2015 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
इंदिरापुरम, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
www.iamrawatji.blogspot.in
शीर्षक : चकबंदी अब कैरी द्यो
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।
गणेश 'गरीब' जी की, बात जरासी सूणी ल्यो।।
हूणु पलायन यख बिटि, चकबंदी अब कैरी द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।
ऐंसु न भ्वाला साल, सूणी-सूणी थकी ग्यावा।
जनमानस की बात थैं, टक्क लगै की सूणी ल्यावा।।
होरी जगह ह्वेगे चकबंदी, यख भी अब कैरी द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।
क्वी यख क्वी वख, क्वी ये छाल क्वी वै छाल।
इनै उनै जांण मा ही, सरया गात जलै याल।।
एक ही समणी सभ्या पुंगडा, हमरा अब कैरी द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।
चकबंदी ह्वे जाली त, बांजा पुंगडा चलदा होला।
होलु खूब अनाज यख, भैर किलै छोड़ी जौंला।।
द्वी चार ख़ुशी का फूल, हमरा जीवन मा ढोली द्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।
नेतागिरी छोड़ी की आज, जरा मनख्यात रैखि ल्यावा।
तुम्हरा ही भै-बंधु हम, बिरोधी नी छावा।।
गरीब क्रांति आंदोलन की बात, झटपट सूणी ल्यो।
कुर्सी मा बैठ्या भैजी, चकबंदी अब कैरी द्यो।।
© 07-11-2015 अनूप सिंह रावत
ग्वीन, बीरोंखाल, पौड़ी, उत्तराखंड
www.iamrawatji.blogspot.in
रिखणी-बीरोंखाल धुमाकोट थैलीसैंण नैनीडांडा.
मिलै की नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार.
हम थैं नि चयेन्दु स्यु तुम्हारु कोटद्वार...
जब राज्य पहाड़ी बणे त जिला किलै ना?
सुपिन्या दिख्यां विकास का विकास कतै ना!
रंगीला पिंगला सुपिन्या दिख्यां करि द्यो साकार...
पैली जिला मुख्यालय दूर च फिर दूर बणाणा किलै?
समणी बणे द्यो मुख्यालय यूं खण्डों थै मिलै!
सुविधा मिलि सकद यखी त फिर किलै जाण कोटद्वार...
हूणु पलायन यख बिटि ज़रा इनै भी देखि ल्यावा.
चिंगारी बणी जौ न मशाल जिला पैली बणे द्यावा.!
कख बणाण जिला जरा सुणि ल्यो जनता का विचार...
गर बणे सकदा त अलग पहाड़ी जिला बणे दियां.
कोटद्वार नि चयेन्दु हमथै नथर पौड़ी ही रैण दियां..
पछ्याण पहाड़ी रैण दियां हमारी अर गढ़वाली अन्वार...
नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार...
नै पहाड़ी जिला बणे द्यो सरकार...
©13-07-15 अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
धन्यवाद तेरु रूड़ी,
त्यारा कारण परदेशी आई.
टुप द्वी दिनों कु ही सै,
अपड़ी देवभूमि भेंटे ग्याई...
धन्यवाद तेरु रूड़ी,
बाल बच्चों दगड़ी आई.
छुट्यों का बाना ही,
अपडू गौं मुलुक देखि ग्याई...
धन्यवाद तेरु रूड़ी,
ढोग्यां द्वार खोलि ग्याई.
चौक तिबारी साफ कैरी,
भैर भितर सब हेरी ग्याई...
धन्यवाद तेरु रूड़ी,
देवी देवतों सेवा लगे ग्याई.
हिंशोला-किन्गोड़ा, काफल, आडू,
सब्बी धाणी खै ग्याई...
धन्यवाद तेरु रूड़ी,
आपस मिंत्र भेंटी ग्याई.
दाना सयाणा देखि की,
परदेश का बाटा पैंटी ग्याई...
धन्यवाद तेरु रूड़ी,
इनि सदानी आंदी रैई.
मेरा भाई-बंधु थैं,
यनि पहाड़ बुलान्दी रैई...
©22-06-15 अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी, उत्तराखंड
ह्युंद बीति ग्याई, रूडी लगी ग्याई.
न तुम आयां घौर, न रंत रैबार आई...
स्या कनि ड्यूटी तुम्हारी, बगत नी च.
पापी पेट का बाना, कनु बिछड़ो कर्युं च.
बाटू देखि-२ अब त, आंखी थकी गैनी.
कब तक स्वामी इना, दूर-२ दिन कटैनी.
खुद मा तुम्हारी झूरी-२ पराण आधा ह्वेगे.
राजी रयां तुम आस कुल देवतों मा रैगे.
झठ बौडी आवा स्वामी अब नि रयेंदु.
यखुली तुम बिगैर ए पहाड़ मा नि जियेंदु.
जारी है ...............
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक : ०१-०५-२०१५ (ग्वीन मल्ला)
::: प्रकृति :::
कितनी सुंदर कितनी न्यारी,
प्रकृति की है छटा निराली.
खुसबू और रंगों से परिपूर्ण,
तरह-२ की फूलों की डाली..
ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से नीचे,
गिरती है सुंदर से जलधारा.
मनभावन दृश्य देखकर लगता,
जैसे हो कोई मोती की माला..
घने बादलों के बीच से,
निकलता इन्द्रधनुष है प्यारा.
ऊँची-नीची टेढ़ी-मेढ़ी राहों से,
शोभित है वनमंडल सारा..
भांति-भांति के पंछी चहकते,
तरह-२ के पौधे और पशुधन.
इतनी सुंदर रचना देखकर,
प्रकृति पर वारी जाए ये मन..
प्रकृति के इस अद्भुद तोहफे को,
संजोकर हमको सदा रखना है.
दोहन करें न इसका अत्यधिक,
भविष्य के खातिर संभलना है..
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक: १५-०४-२०१५ (इंदिरापुरम)
मैं मुसाफिर
चल रहा हूँ
मंजिल की ओर..
सपने देखे जो
इन आँखों ने
बढ़ता उनकी ओर..
है डगर कठिन
जानता हूँ मैं
दिखे न कुछ और..
कदम-2 बढाकर
अनुभव उकेरता
पकड़े विश्वास की डोर..
गिरता फिर उठता
मन मजबूत कर
चलता उसकी ओर..
होगी जीत जरूर
लक्ष्य भेद दूंगा
बढ़ रहा विजय की ओर..
© अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक: 14-04-2015 (इंदिरापुरम)
क्यों बदल गया इंसान,
क्यों खो गयी मानवता,
इस धरा पर ............
हे प्रभु यह क्या हो रहा है?
बढ़ रहे हैं पाप व अत्याचार,
गरीब की अब आह निकलती,
धरती करवट बदल रही है,
हे प्रभु यह क्या हो रहा है?
स्वार्थ के आगे धर्म झुकता है,
नरसंहार क्यों नहीं रुकता है,
तूफान मचा है इस धरा पर,
हे प्रभु यह क्या हो रहा है?
देवी स्वरुप कन्या की यहाँ,
इज्जत अब हर दिन लुटती है,
रिश्ते नाते हुए तार – तार,
हे प्रभु यह क्या हो रहा है?
इच्छाएं प्रतिदिन बढती जाती,
प्रकृति की शान पर चोट करती,
संभाल ले वक्त से पहले,
हे प्रभु यह क्या हो रहा है?
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – १३-०४-२०१५ (इंदिरापुरम)
आया जमाना रिश्वत का,
चंद रुपयों के खातिर,
ईमानदारी बेच दी इसने,
देख जमाना रिश्वत का।
बिना रिश्वत के काम नहीं,
फैला कैसा यह जाल है?
मजबूरी का नाम देकर,
कोई बना मालामाल है।
अगर लेने वाले चार हैं,
तो देने वाले आठ हैं,
बाबू जी बन बैठे करोड़पति,
वाह जी क्या ठाठ हैं !
किसी को भी सब्र नहीं,
शायद धन की कमी नहीं,
लेने वाला गुनेहगार है,
तो देने वाला क्यों नहीं?
गरीब इसमें पिस जाता है,
खून के आंसू रोता है,
भटक रहा है यहाँ वहां,
पर अंत सुखद नहीँ होता है।
इसका खिलाफ खड़े होकर,
कुछ लोग नेता बन गए,
धीरे-धीरे वो सब भी,
चोर के मौसेरे भाई बन गए!
इसे रोकने के खातिर,
अब तो कुछ करना होगा,
सब को मिल-जुल कर,
दूर इसे भगाना होगा।
रिश्वत न देंगे न लेंगे कभी,
आज शपथ लें हम सभी,
रावत अनूप बस कहे इतना,
एक सुंदर भविष्य बनेगा तभी।।
© अनूप रावत "गढ़वाली इंडियन"
दिनांक : १२-०४-२०१५ (इंदिरापुरम)
फागुण देखा ऐग्याई,
त्योहार रंगों कु ऐग्याई.
स्वर्ग से लेकि धरा तक,
स्वाणी बहार ऐग्याई..
रंगी जौंला सभी रंग मा,
प्यार खतेणु लगी ग्याई.
मुखुड़ी गात रंग्याणा कु,
अबीर गुलाल ऐग्याई..
फूलों मा फुलार ऐग्याई,
डांडी कांठ्यूं मौल्यार ऐग्याई.
चौ तरफों बहार देखि की,
मनिख्यों मा उलार ऐग्याई..
बनी-२ पकवान बणला,
चुला कढ़े चढ़ी ग्याई.
मिली बांटी की खौंला,
रीत सदनी बिटि य राई..
आवा दगिड्यों चौक मा,
होरी का गीत गावा.
रंगमत ह्वे जावा सभि,
होली रंग मा रंगी जावा.
अवध मा खेलला होरी,
साक्षात सीता राम.
गोप्युं का दगिडी फूलों की,
बृन्दावन मा राधा श्याम..
फागुण देखा ऐग्याई,
त्योहार रंगों कु ऐग्याई..
© अनूप सिंह रावत “गढ़वाली इंडियन”
दिनांक – ०४-०३-२०१५ (इंदिरापुरम)